भारतीय संस्कृति के सनातन धर्म में हिंदू धर्मशास्त्राें के अनुसार 33 काेटि देवी-देवताओं में भगवान शिवजी देवाधिदेव महादेव की उपमा से अलंकृत हैं. भगवान शिवजी की विशेष कृपाप्राप्ति के लिए शिवपुराण में विविध व्रताें का उल्लेख है, जिसमें श्रावण मास के साेमवार का व्रत प्रमुख हैं. श्रावण मास के सभी साेमवार काे व्रत रखा जाता है. इस बार श्रावण मास का प्रथम साेमवार, 3 अगस्त काे है. इस दिन पंचमी तिथि संपूर्ण दिन रहेगी.
उत्तराभाद्रपद नक्षत्र रविवार, 2 अगस्त की रात्रि 9 बजकर 37 मिनट से साेमवार, 3 अगस्त काे रात्रि 10 बजकर 01 मिनट तक रहेगा. सुकर्मा याेग रविवार, 2 अगस्त की रात्रि 10 बजकर 30 मिनट से साेमवार, 3 अगस्त काे रात्रि 9 बजकर 14 मिनट तक रहेगा. श्रावण मास में प्रदाेष व्रत, शिव चतुर्दशी के व्रत की भी विशेष महिमा है.
श्रावण मास में स्वच्छ मिट्टी, गंगाजल से पार्थिव शिवलिंग निर्माण कर विधि- विधानपूर्वक पूजन किया जाता है. वैसे ताे कभी भी भगवान शिवजी की पूजा की जा सकती है. इन दिनाें शिवालय में नियमित रूप से दर्शन-पूजन करना भी लाभकारी रहता है. श्रावण मास में शिवभ्नत कांवड़ यात्रा करके भगवान शिवजी काे जल अर्पित कर उनकी पूजा-अर्चना करते हैं, जिससे देवाधिदेव महादेव अपने भ्नताें काे श्रावण के पावन महीने में अपनी कृपा-प्रसाद से सराबाेर कर देते हैं.
शिवजी की पूजा का विधान - व्रतकर्ता काे प्रातःकाल सूर्याेदय के पूर्व ब्रह्ममुहूर्त में उठकर समस्त दैनिक कृत्याें से निवृत्त हाे स्नान कर स्वच्छ (धुले हुए) वस्त्र धारण करके अपने आराध्य देवीदेवता की पूजा-अर्चना करनी चाहिए. तत्पश्चात् अपने दाहिने हाथ में जल, पुष्प, फल, गंध व कुश लेकर व्रत का संकल्प लेना चाहिए. संपूर्ण दिन निराहार रहते हुए सायंकाल पुनः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करके पूर्वाभिमुख या उत्तराभिमुख हाेकर भगवान शिवजी की विधि-विधानपूर्वक पूजा करनी चाहिए.
भगवान शिवजी का अभिषेक करके उन्हें वस्त्र, यज्ञाेपवीत, आभूषण, सुगंधित द्रव्य के साथ बेलपत्र, कनेर, धतूरा, मदार, ऋतुपुष्प, नैवेद्य आदि जाे भी सुलभ हाे, अर्पित कर श्रृंगार करना चाहिए. तत्पश्चात् धूप-दीप प्रज्ज्वलित कर आरती करनी चाहिए.
पंचाेपचार, दशाेपचार अथवा षाेडशाेपचार पूजा-अर्चना करनी चाहिए. धार्मिक परंपरा के अनुसार जगतजननी माता पार्वतीजी की भी पूजा-अर्चना करने का विधान है.
शिवभ्नत अपने मस्तक पर भस्म व तिलक लगाकर शिवजी की पूजा करें, ताे पूजा शीघ्र फलित हाेती है.
व्रतकर्ता काे दिन में शयन नहीं करना चाहिए, साथ ही क्षाैरकृत्य नहीं करना चाहिए. व्रत के दिन नियमित संयमित एवं पूर्ण शुचिता के साथ रहना चाहिए.
काैन-सा करें पाठ - भगवान शिवजी की महिमा में शिव चालीसा, शिवस्तुति, शिव सहस्त्रनाम, शिव महिम्नस्ताेत्र, शिवतांडव स्ताेत्र, रुद्राष्टक, शिवपुराण आदि का पाठ करना चाहिए तथा शिवजी के प्रिय पंचाक्षर मंत्र ‘ॐ नमः शिवाय’ का मानसिक जप करना चाहिए.
शिवपुराण के अनुसार ‘ॐ नमः शिवाय शुभं शुभं कुरु कुरु शिवाय नमः ॐ’ इस मंत्र के जप से सर्वविध कल्याण हाेता है.
मनाेरथ की पूर्ति के लिए
रात्रि के चाराें प्रहर की पूजा विशेष फलदायी
प्रथम प्रहर : भगवान शिव जी का दूध से अभिषेक करें एवं ॐ ह्रीं ईशान्य नमः मंत्र का जप करें.
द्वितीय प्रहर : भगवान शिव जी का दही से अभिषेक करें तथा ॐ ह्रीं अघाेराय नमः मंत्र का जप करें.
तृतीय प्रहर : भगवान शिव जी का शुद्ध देशी घी से अभिषेक करें, साथ ही ॐ ह्रीं वामदेवाय नमः मंत्र का जप करें.
चतुर्थ प्रहर : भगवान शिव जी का शहद से अभिषेक करें एवं ॐ ह्रीं सध्याेजाताय नमः मंत्र का जप करें.
साेमवार का व्रत समस्तजनाें के लिए शुभ फलकारी है. व्रतकर्ता काे दिन के समय शयन नहीं करना चाहिए. व्रत के दिन अपने परिवार के अतिर्नित कहीं कुछ भी ग्रहण नहीं करना चाहिए. व्रतकर्ता काे अनर्गल वार्तालाप नहीं करना चाहिए. यथासंभव माैन रहते हुए भगवान शिवजी का मंत्र ‘ॐ नमः शिवाय’ का जप करना चाहिए. अपनी दिनचर्या काे नियमित संयमित रखते हुए व्रत कर लाभान्वित हाेना चाहिए. अपनी सामर्थ्य के अनुसार ब्राह्मण एवं असहायाें की सेवा व सहायता करनी चाहिए. श्रावण मास के साेमवार का व्रत-पूजन करने से जीवन में सुख-समृद्धि का वरदान मिलता है.
- ज्याेतिर्विद् श्री विमल जैन