कोथरुड़, 21 अगस्त (आ. प्र.) श्री वर्धमान सांस्कृतिक प्रतिष्ठान, कोथरुड, पुणे में विराजित गुरु सुमति शिष्य, उपप्रवर्तक, तप दिवाकर गुरुदेव श्री अभिषेक मुनिजी म. सा. ने कहा कि, वर्ष के लगभग आठ महीने मनुष्य सांसारिक कार्यों में व्यस्त रहता है. चातुर्मास ऐसा पावन अवसर है, जब सांसारिक गतिविधियों को कुछ समय के लिए विराम देकर आत्मचिंतन, धर्माराधना एवं आत्म-उत्थान की ओर अग्रसर हुआ जा सकता है. संसार में रहते हुए व्यक्ति अपने सभी सांसारिक कार्यों का पूर्णतः त्याग नहीं कर सकता, लेकिन एक श्रावक का ध्येय होना चाहिए कि वह अपने जीवन का अधिकाधिक समय धर्म, ध्यान, स्वाध्याय, जप एवं तप में व्यतीत करे. चातुर्मास की सार्थकता इसी में है कि इन चार महीनों में व्यक्ति संसार की आपाधापी से कुछ पीछे हटकर अपनी आत्मा की ओर दृष्टि करे और अपने जीवन को आध्यात्मिक उन्नति की दिशा में ले जाए. आगम में जीवन के लिए विधि और निषेध दोनों का वर्णन किया गया है. जीवन में क्या करना चाहिए, उसे विधि कहा जाता है और किन कार्यों का त्याग करना चाहिए, उसे निषेध कहा जाता है. जिस पवित्र वाणी में जीवन के कल्याण के लिए इन दोनों का सम्यक् विवेचन प्राप्त होता है, वही आगम है. तीर्थंकर भगवंतों ने राग और द्वेष को कर्मबंधन का मूल कारण बताया है. परमात्मा ने राग-द्वेष से मुक्त होने का मार्ग बताया, लेकिन मनुष्य की वर्तमान स्थिति पर विचार करें तो आज जीवन में राग, द्वेष और ईर्ष्या का प्रभाव दिखाई देता है. अच्छाई के मार्ग पर चलने के लिए व्यक्ति को कई बार अकेले चलना और संघर्ष करना पड़ता है, जबकि बुराई शीघ्र संगठित होकर आगे बढ़ती है. इसलिए धर्ममार्ग पर चलने वाले व्यक्ति को समाज की प्रतिक्रिया अथवा दूसरों के समर्थन की प्रतीक्षा किए बिना अपने संकल्प पर दृढ़ रहना चाहिए.