
कर्म सिद्धांत, जैन दर्शन को समझने की चाबी है. कर्म क्या होते है और किस प्रकार से फल देते है, यह सब समझ आता है. वास्तव में कर्म जड़ है, उसमें चेतना नहीं है, लेकिन कर्म में शक्ति होती है. कर्म जब आत्मा से जुड़ जाती है तो आत्मा की शक्ति से प्रभाव करता है. जब हम मन, वचन, काया से कोई क्रिया करते है, तो उसे योग कहते हैं और इन योग के कारण कर्म हमारे पास आते हैं, और जब हमारे मन में लोभ-माया-अहंकार उत्पन्न होते हैं तो ये कर्म हमसे चिपक जाते हैं. कर्म के 8 भेद हैं लेकिन दो प्रकार के मुख्य विभाग होते हैं, घाती कर्म और अघाती कर्म. जिन कर्मों को हम पुरुषार्थ से नष्ट/अलग कर सकते हैं उन्हें ‘घाती कर्म’ कहा गया है और जो कर्म फल देने के बाद ही क्षय होते हैं, जिनको भोगना ही पड़ता है और जिन कर्मों के ऊपर कोई पुरुषार्थ नहीं किया जा सकता उन्हें ‘अघाती कर्म’ कहते हैं. आयुष्य कर्म, नाम कर्म, गोत्र कर्म, वेदनीय कर्म ये सारे शरीर संबंधित अघाती कर्म होते है, जिनको अलग नहीं किया जा सकता, वे उदय होते ही हैं. आघाती कर्म से कर्मों का बंधन नहीं होता. ज्ञानावरणीय, दर्शनावरणीय, मोहनीय और अंतराय कर्म ये घाती कर्म होते है. ज्ञान, दर्शन और वीर्य आत्मा के स्वभाव होने के कारण उनसे कर्मों का बंधन नहीं होता है. लोभ-माया और मिथ्यात्व के कारण मोहनीय कर्म से कर्मबंधन होता है. जितनी ज्यादा तीव्रता लोक-माया में होती है उतना तीव्र कर्म का बंधन होता है, उतना ज्यादा फल भोगना है. कुछ कर्म हमारे पूर्वजन्म के कारण भी उदय में आते हैं, इसलिए अब हमें जागृत रहकर नए कर्म नहीं बांधने हैं, इसका ध्यान रखना है और शुभ कर्मों को उदय में लाना है. - साध्वी संयमप्रीतिजी, लोणीकंद, पुणे