पिंपरी, 24 अगस्त (आ.प्र.)
पिंपरी स्थित बाबा छतुनराम लाल मंदिर से साेमवार की शाम काे एक शाेभायात्रा निकाली गई. इस शाेभायात्रा में विभिन्न वेशभूषाधारी कलाकार, ढाेल ताशा मंडली, वारकरी दिंडी, विभिन्न भगवान झूलेलाल मंदिराें की मूर्तियां और सिंधी समाज के विभिन्न गुरुओं की मूर्तियां रखी गइंर्. महिलाओं और युवाओं की भारी भागीदारी रही.
महिलाएं नृत्य और भजन गाते हुए शामिल हुईं. हिंदू समाज के सदस्याें ने भी बड़े उत्साह के साथ इसमें भाग लिया.
चालिहाे पूजा की यह प्राचीन काल की परंपरा लगातार आज भी जारी प्राचीन काल में, जब भारत एक एकीकृत देश था, उसका एक भाग सिंधु नदी के किनारे स्थित था. उस भाग काे सिंधु देश कहा जाता था और वह मूल रूप से हिंदू था. उस समय, जब एक मुस्लिम राजा मीर शाह ने आक्रमण किया, ताे उसने उस क्षेत्र के लाेगाें पर अत्याचार करना शुरू कर दिया.
उन्हें जबरन धर्म परिवर्तन करने के लिए मजबूर किया. लेकिन वे व्यथित हिंदू भाई अपना धर्म बदलने काे तैयार नहीं थे, तब वे लाेग सिंधु नदी के किनारे आए और चालीस दिनाें तक जल देवता की पूजा-अर्चना की.
चालीसवें दिन, सिंधु नदी से मछली पर सवार वरुण देवता प्रकट हुए.
उनका नाम झूलेलाल था और उन्हाेंने उन व्यथित लाेगाें की रक्षा की. तब लाेगाें ने चालीस दिनाें का उपवास शुरू किया. उस पूजा काे चालिहाे कहा जाता है. इसलिए, सिंधी व हिंदू भाइयाें ने इन चालीस दिनाें के दाैरान प्रार्थना, भजन, कीर्तन और प्रवचन करना शुरू किया.