कोथरुड़, 24 अगस्त (आ. प्र.)
श्री वर्धमान सांस्कृतिक प्रतिष्ठान, में विराजित गुरुदेव श्री अभिषेक मुनिजी म. सा. ने कहा कि, किसी भी जीवात्मा के भवों की गणना सम्यकत्व की प्राप्ति के बाद ही होती है. किसी भी तीर्थंकर के जीवन चरित्र का अध्ययन करें तो उनके भव भ्रमण की गाथा भी सम्यक्त्व के स्पर्श से ही प्रारंभ होती है. सम्यक्त्व प्राप्ति से पूर्व उनके जीवन का कोई विशेष वर्णन प्राप्त नहीं होता. जब जीवात्मा को सम्यक्त्व की प्राप्ति होती है, तब वह मोक्ष मार्ग की ओर अग्रसर होने लगता है. जब तक जीव मिथ्यात्व के अंधकार से ग्रसित रहता है, तब तक वह संसार में परिभ्रमण करता रहता है, किंतु आत्मा के साथ एक बार सम्यक्त्व का स्पर्श हो जाए तो उसके संसार का भ्रमण सीमित होने लगता है. जीवात्मा मिथ्यात्व के कारण संसार में बंधी रहती है. ज्ञानीजनों ने 25 प्रकार के मिथ्यात्व का वर्णन किया है. जब जीवन से मिथ्यात्व का अंधकार दूर होने लगता है, तब व्यक्ति अपने दोषों को देखना प्रारंभ करता है. उसकी मोह-माया मंद होने लगती हैं और उसकी सोच में सकारात्मक परिवर्तन आने लगता है. परिणामस्वरूप उसके अंतर में क्षमा का भाव जागृत होता है और वह अपने शत्रु में भी शत्रुता के भाव को देखने के बजाय क्षमा और समता का भाव रखने लगता है. हमें स्वयं से विचार करना चाहिए कि क्या हम वास्तव में सही ढंग से धर्म और ध्यान के मार्ग पर आगे बढ़ रहे हैं? धर्म केवल बाहरी क्रियाओं तक सीमित न रहकर आत्मा के भीतर परिवर्तन का माध्यम बने, तभी उसका वास्तविक लाभ प्राप्त हो सकता है.