नई दिल्ली, 25 अगस्त (वि.प्र.)
ग्लाेबल फूड कंपनियाें का भेदभाव पूर्ण काराेबार बेनकाब हुआ है. एक ही ब्रांड, एक ही कलर, पैकेट एक जैसा लेकिन विदेशाें में उच्च क्वालिटी के वहीं भारत में घटिया माल की सप्लाई हाेती है.
‘ए्नसप्लेन ऑन फूड क्वालिटी’ में चाैंकाने वाला खुलासा हुआ है. भारत में बिकनेवाले खाद्य पदार्थ ऊपर से दिखने में स्टैंडर्ड लगते हैं. लेकिन प्राेड्नट में तीन गुना ज्यादा शक्कर है, सस्ते तेल आर्टिफिशियल रंग का भी प्रयाेग हाे रहा है, चाॅकलेट, मैगी, काेल्ड ड्रिंक सहित सभी मानक में विदेशाें की तुलना में भारत में हल्के प्राेड्नट की सप्लाई हाे रही है.
इसके चलते भारत में माेटापा जैसे राेगाें का खतरा बढ़ रहा है. सुप्रीम काेर्ट तक यह मामला पहुंचा है. एक ही कंपनी, एक ही ब्रांड, पैकेट का रंग भी लगभग वही, लेकिन जाे प्राेडक्ट लंदन या सिडनी की दुकान पर बिक रहा है और जाे आपके माेहल्ले की दुकान पर टंगा है, अंदर से दाेनाें एक जैसे नहीं हैं. कहीं चीनी ज्यादा है, कहीं तेल सस्ता है और सबसे बड़ा फर्क यह है कि विदेश में जिस चीज पर पैकेट के सामने ही लाल निशान लगाकर चेतावनी दी जाती है, भारत में वही जानकारी पीछे छाेटे अक्षराें में लिखी हाेती है.
लंदन में बिकने वाली फैंटा के एक कैन में करीब 63 कैलाेरी हाेती है. वही ब्रांड भारत में खरीदिए ताे उसमें करीब तीन गुना ज्यादा चीनी मिलती है. इसमें एक आर्टिफिशियल रंग भी हाेता है. यूराेप में इस रंग के इस्तेमाल पर पैकेट के सामने साफ चेतावनी लिखनी पड़ती है.
भारत में यही बात कैन के पीछे छाेटे अक्षराें में दर्ज रहती है, जहां आम खरीदार की नजर जाती ही नहीं.दिलचस्प बात यह है कि जाे कंपनियां भारत में ऐसे लेबल का विराेध करती रही हैं, वही यूराेप के करीब दाे दर्जन बाजाराें में अपनी ड्रिंक्स पर ट्रैफिक लाइट जैसे लेबल खुद लगाती हैं और उसे पारदर्शिता बताती हैं.
भारत में बिकने वाले आम किटकैट में काेकाे साॅलिड करीब साढ़े चार फीसदी हाेता है. ऑस्ट्रेलिया में बिकने वाले किटकैट की मिल्क चाॅकलेट में कम से कम 22 फीसदी काेकाे हाेता है, यानी जिस चीज के लिए लाेग चाॅकलेट खरीदते हैं, भारतीय वर्जन में वही सबसे कम है.