विज्ञान शरीर में, धर्म आत्मा में और -दर्शन शास्त्र मन में आस्था रखते हैं

    26-Aug-2026
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vichar 
मनुष्य के पास तीन पर्तें हाेती हैं- पहिली है शरीर-दूसरी पर्त है मन और तीसरी है आत्मा. इसे ठीक से समझ लेना है. आत्मा एक वास्तविक यथार्थ है. मन और कुछ भी नहीं, बल्कि वह इन दाेनाेें के मध्य एक सेतु है, याें अपने आपमेें वह निर्मूल्य है.
 
एक सेतु या पुल का अपने आप में काेई भी मूल्य नहीं हाेता. उसका केवल यही मूल्य है कि वह दाे किनाराें काे जाेड़ने वाला पुल है. उसके पास काेई अंतर्निहित मूल्य नहीं है. दाेनाें किनारे बिना पुल के भी बने रह सकते हैं; लेकिन बिना किनाराें के पुल का काेई भी अस्तित्व नहीं है. इसकी केवल एक उपयाेगिता है, यह साधन है. मन वहाँ हाेता है, जहाँ आत्मा और शरीर दाेनाें एक दूसरे काे लगभग आच्छादित करते हैं. जहाँ शरीर और आत्मा किसी सीमा तक एक-दूसरे काे आच्छादित करते हैं, वहाँ वास्तविकता का एक भ्रम उत्पन्न हाे जाता है. यह भ्रम ही मन है. विज्ञान की आस्था शरीर में हाेती है और धर्म की आस्था, आत्मा में हाेती है. दर्शनशास्त्र, मन में विश्वास किए चले जाता है, वह मन का एक खेल है.
 
और स्मरण रहे, जब तुम पूरी तरह से अपने शरीर में रहते हाे, मन मिट जाता है. अथवा जब तुम समग्रता से आत्म अथवा चेतना में हाेते हाे, तब भी मन विसर्जित हाे जाता है. यदि तुम प्रेम कर रहे हाे और तुम समग्रता से शरीर में हाे, ताे कुछ क्षणाें के लिए वहाँ मन हाेता ही नहीं. तुम शरीर की वास्तविकता में इतनी समग्रता से डूब जाते हाे कि मन अस्तित्व में रह नहीं सकता अथवा यदि तुम गहरे ध्यान में हाे, पूरी तरह उसमें डूबे हुए हाे, तब भी मन विसर्जित हाे जाता है.
वास्तविकता अर्थात सत्य हमेशा अमन में हाेता है.