पिंपरी, 25 अगस्त (आ.प्र.)
अभिभावकाें और शिक्षा अधिकार कार्यकर्ताओं ने सरकारी स्कूलाें की गिरती हालत और निजी संस्थानाें द्वारा मनमानी फीस वसूली पर चिंता जताई है. उन्हाेंने चेतावनी दी है कि यदि इन मुद्दाें का समाधान नहीं किया गया ताे वे सड़काें पर उतरेंगे. यह चेतावनी शुक्रवार काे पिंपरी के ज्ञानज्याेति सावित्रीबाई फुले सभागृह में आयाेजित ‘शिक्षा हक परिषद’ में व्यक्त की गई.सम्मेलन में स्कूली शिक्षा से जुड़े कई मुद्दाें पर चर्चा हुई. छावा मराठा युवा महासंघ ने कहा कि वह छात्राें और अभिभावकाें की समस्याओं काे उजागर करने तथा कथित अन्याय के मामलाें काे अधिकारियाें के संज्ञान में लाने के लिए एक विराेध अभियान शुरू करेगा.
वक्ताओं ने कहा कि शिक्षा व्यवस्था काे बदलते समय के साथ ताल-मेल बिठाने की जरूरत है, क्याेंकि अभिभावक अपने बच्चाें के लिए तकनीक-आधारित और काैशलउन्मुख शिक्षा की मांग कर रहे हैं. हालांकि, उन्हाेंने आराेप लगाया कि इन बदलती उम्मीदाें के बावजूद सरकारी शिक्षा प्रणाली में जरूरी सुधार नहीं किए जा रहे हैं.
सरकारी स्कूल कंप्यूटर लैब, खेल के मैदान और साफ शाैचालयाें सहित बुनियादी ढांचे की कमी से जूझ रहे हैं. साथ ही, शिक्षकाें पर सर्वेक्षण और प्रशासनिक कार्याें जैसे गैर-शिक्षण कार्याें का बाेझ डाला जाता है, जिससे उनके पास छात्राें पर व्यक्तिगत ध्यान देने के लिए कम समय बचता है.
वक्ताओं का दावा है कि शिक्षा की गुणवत्ता में लगातार गिरावट के कारण अभिभावक सरकारी स्कूलाें से विमुख हाे रहे हैं.
सरकारी व्यवस्था की खामियां उन्हाेंने आराेप लगाया कि निजी स्कूल सरकारी व्यवस्था की कमियाें का फायदा उठा रहे हैं और सरकारी नियमाें का उल्लंघन करते हुए अवैध डाेनेशन और अत्याधिक फीस बढ़ाेतरी के जरिए अभिभावकाें का शाेषण कर रहे हैं. मुफ्त शिक्षा के लिए शिक्षा का अधिकार (आरटीई) अधिनियम के प्रावधानाें के बावजूद, कथित ताैर पर अभिभावकाें काे पाठ्यपुस्तकाें, पाेशाक और अन्य शैक्षणिक सामग्रियाें का भुगतान करने के लिए मजबूर किया जा रहा है.
अभिभावकाें से ‘अन्य गतिविधियाें’ और सांस्कृतिक कार्यक्रमाें के नाम पर भी पैसे एेंठने का आराेप है. सरकारी अनुदान प्राप्त करने वाले कई प्रतिष्ठित सहायता प्राप्त स्कूलाें पर उच्च कक्षाओं में प्रवेश के समय अनियमित साधनाें से पैसे मांगने के आराेप लगे.
आयाेजकाें ने कहा कि ऐसी प्रथाओं काे नियंत्रित करने में शिक्षा विभाग की विफलता ने निम्न और मध्यम आय वाले परिवाराें काे अपर्याप्त सरकारी शिक्षा प्रणाली और निजी स्कूलाें की बढ़ती वित्तीय मांगाें के बीच फंसा दिया है. उन्हाेंने मांग की कि सरकार अपने स्कूलाें की गुणवत्ता में सुधार करे और नियमाें का उल्लंघन करने वाले संस्थानाें के खिलाफ सख्त कार्रवाई करे.