पंचेंद्रियों का सदुपयोग श्रेष्ठ होता है : अभिषेक मुनि

    27-Aug-2026
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कोथरुड़, 26 अगस्त (आ. प्र.)

श्री वर्धमान सांस्कृतिक प्रतिष्ठान, कोथरुड, पुणे में विराजित गुरु सुमति शिष्य, उपप्रवर्तक, तप दिवाकर गुरुदेव श्री अभिषेक मुनिजी ने कहा कि, मनुष्य को पांच इंद्रियों के रूप में अत्यंत महत्वपूर्ण साधन प्राप्त हुए हैं. यदि इनका विवेकपूर्वक और सदुपयोग किया जाए तो व्यक्ति अपने जीवन को श्रेष्ठ एवं सार्थक बना सकता है. इंद्रियों की क्षमता अत्यंत व्यापक है, किंतु वर्तमान में मनुष्य अपनी इंद्रियों की सामर्थ्य का बहुत अल्प भाग ही उपयोग कर पाता है. श्रोत्र इंद्रिय अर्थात कान की श्रवण शक्ति पूर्ण रूप से विकसित हो तो बारह योजन तक की ध्वनि सुनने की क्षमता का उल्लेख मिलता है. हमारी इंद्रियों में इतनी क्षमता और सामर्थ्य विद्यमान है कि हम बहुत दूर तक देख और सुन सकते हैं, लेकिन वर्तमान जीवनशैली में हम उसका पूरा उपयोग नहीं कर पाते. ज्ञान के संरक्षण और प्रसार की हमारी प्राचीन परंपरा श्रवण एवं स्मरण पर आधारित थी. लेखन की परंपरा प्रारंभ होने से पूर्व गुरु-शिष्य परंपरा के माध्यम से सुनकर और स्मरण कर ज्ञान को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचाया जाता था.भगवान महावीर स्वामी के निर्वाण के लगभग 980 वर्षों पश्चात आगमों के लेखन का कार्य प्रारंभ हुआ. इससे पूर्व श्रुत ज्ञान का हस्तांतरण मुख्यतः गुरु-शिष्य परंपरा के माध्यम से ही होता था. आज विज्ञान ने अनेक साधनों और तकनीकों का आविष्कार कर लिया है तथा निरंतर नए अनुसंधान हो रहे हैं, लेकिन अभी तक वह मूल तंत्र पूरी तरह समझ पाना संभव नहीं हुआ है जिसके कारण हमारी इंद्रियों में देखने और सुनने की शक्ति उत्पन्न होती है. इंद्रियों का प्राप्त होना हमारे पुण्य का परिणाम है. परमात्मा ने उपदेश दिया है कि जब तक इंद्रियां सक्षम हैं, तब तक इनका सदुपयोग करते हुए धर्म, साधना और आत्मकल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ना चाहिए.