जीवन की प्रयोगशाला में हर किसी को प्रवेश नहीं

    27-Aug-2026
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osho
पुराने दिनाें में तिब्बत के आश्रम में जब काेई प्रवेश हाेता था ताे प्रवेश के पहले ही सारी परीक्षाएं उसे देनी पड़ती थीं.
एक छाेटा बच्चा एक आश्रम में प्रवेश हाेने काे गया. उसके पिता चाहते थे- बचपन से ही उसमें एक प्रतिभा थी, अनूठी प्रतिभा थी, ज्याेति थी, चमक थी- कि वह संसार में खाे न जाए, उसकी ज्याेति बढ़े, उसकी चमक बढ़े, उसकी प्रतिभा निखरे. उसे आश्रम भेजा.
उसे आश्रम के द्वार पर बिठा दिया गया और कहा गया, आंख बंद रखाे. उसकी उम्र ज्यादा से ज्यादा दस साल है. आंख बंद रखाे.
आंख खाेलना मत, चाहे कुछ भी हाे जाए. अगर आंख खाेली, ताे प्रवेश नहीं मिलेगा. और कितने देर बाद तुम बुलाए जाओगे, कुछ कहा नहीं जा सकता. घंटे लग सकते हैं, दिन भी लग सकते हैं. मगर यह तुम्हारी परीक्षा है- धैर्य की, संताेष की, स्वीकार की.
 
वह बच्चा आंख बंद करे बैठा है. अब छाेटे बच्चे काे आंख बंद करके बैठना बड़ी कठिन बात है, बहुत कठिन बात है! सबसे कठिन बात यही है. जैसे बड़े आदमियाें काे आंख खाेलकर बैठना कठिन बात है. हजार चीजें बुलाती हैं. एक कुत्ता निकल गया भाैंकता हुआ. अब उसका दिल हाेता है कि देख ताे लें, किसका कुत्ता है! क्या मामला है! कैसा कुत्ता है! सड़क पर झगड़ा हाेने लगा, पास से लाेग गुजर रहे हैं, लाेग अंदर-बाहर आ-जा रहे हैं, पर वह आंख बंद किए बैठा है दरवाजे पर. वह हिलता-डुलता नहीं, वह पत्थर की तरह बैठा है. अट्ठारह घंटे बाद बुलाया गया. भूखा-प्यासा वह बैठा है आंख बंद किए. काेई उसकाे देख रहा है कि वह आंख खाेलता नहीं. अट्ठारह घंटे उस बच्चे ने आंख बंद रखी! गहन प्रमाण दे दिया कि काेई साधारण बच्चा नहीं है. ाैलाद का बना है. जरूरत पड़ेगी ताे आग से गुजर सकेगा. गुरु स्वयं आया और उस बच्चे काे हाथाें में उठाकर लेकर भीतर गया. स्वीकार हाे गया.