कोथरुड़, 27 अगस्त (आ. प्र.) श्री वर्धमान सांस्कृतिक प्रतिष्ठान में विराजित गुरुदेव श्री अभिषेक मुनिजी ने कहा कि, मनुष्य जीवन को पुण्य का पुंज कहा गया है. ज्ञानीजनों ने केवल मनुष्य शरीर की प्राप्ति को ही दुर्लभ नहीं बताया, बल्कि मनुष्य जन्म के साथ मिलने वाले अन्य महत्वपूर्ण संयोगों की प्राप्ति को भी अत्यंत दुर्लभ माना है. मनुष्य जन्म हमने न जाने कितनी बार प्राप्त किया होगा, किंतु जब इस मनुष्य जीवन के साथ वे दस महत्वपूर्ण संयोग भी प्राप्त होते हैं, तभी यह मनुष्य जन्म वास्तविक अर्थों में दुर्लभ बनता है. इन संयोगों में पांचों इंद्रियों का परिपूर्ण एवं स्वस्थ होना भी अत्यंत महत्वपूर्ण है. पांच इंद्रियां प्राप्त होना अपने आप में बड़ी पुण्यवाणी का उदय है, लेकिन यदि इंद्रियों में पूर्णता न हो तो जीवन अनेक कठिनाइयों और असहजताओं से घिर जाता है, इसलिए मनुष्य जन्म के साथ इंद्रियों की परिपूर्णता प्राप्त होना भी अत्यंत आवश्यक है. श्रोत्र इंद्रिय हमारे मन और जीवन को अत्यंत गहराई से प्रभावित करती है. मनुष्य अपनी प्रशंसा सुनकर अहंकार से भर जाता है और आलोचना सुनकर व्यथित हो जाता है, इसलिए केवल सुनना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि सुनी हुई बातों का विवेकपूर्ण मूल्यांकन करना भी आवश्यक है. जब प्रकृति और पुण्य ने हमें इतनी समर्थ इंद्रियां प्रदान की हैं, तो उनका सदुपयोग करना हमारा कर्तव्य है. हमें ऐसा ही सुनना चाहिए जो जीवन में ज्ञान, विवेक, शांति और सद्भाव को बढ़ाए तथा ऐसी बातों से बचना चाहिए जो मन में अहंकार, द्वेष, क्रोध या हिंसा के भाव उत्पन्न करें. मनुष्य जीवन केवल प्राप्त करने के लिए नहीं, बल्कि प्राप्त साधनों का सदुपयोग कर आत्मकल्याण करने के लिए मिला है.