दुविधा में अपने चित्त को कैसे दें संतुलन

    29-Aug-2026
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mentalhealth
जब भी तुम दुविधा में हाे- हृदय किसी चीज के लिए पूरी तरह से हां कहता हाे, और बुद्धि की व्यावहारिक दृष्टि ना कहती हाे, या िफर बुद्धि किसी चीज के समर्थन में हाे और हृदय बिल्कुल उस ओर न जाना चाहे- ताे इस प्रयाेग काे एक खेल की तरह से लाे.
 
यह प्रयाेग किसी निर्णय तक पहुंचने के लिए नहीं है, यह प्रयाेग है चित्त में एक संतुलन लाने का. सवाल इस बात का नहीं है कि तुम पक्ष में निर्णय लाे या विपक्ष में, क्याेंकि हर पक्ष के अपनेअपने निगेटिव और पाॅजिटिव बिंदु हाेते हैं. ताे सवाल इस बात का नहीं है कि तुम क्या चुनाे? सवाल है कि तुम जाे भी चुनाे वह चुनाव पूरा हाे. और उससे आने वाला हर पाॅजिटिव और निगेटिव परिणाम तुम्हें स्वीकार हाे.
 
कभी भी, जब स्वयं काे असमंजस में पाओ ताे दाेनाें पांव ैलाकर खड़े हाे जाओ. आंखें बंद कर लाे और महसूस कराे कि किस पांव पर ज्यादा बाेझ है? तुम्हारा दायां हिस्सा तुम्हारी बुद्धि का प्रतिनिधित्व करता है और बायां हिस्सा हृदय का.
 
अगर लगे कि दाईं ओर बाेझ ज्यादा है ताे थाेड़ा बाेझ बाईं ओर ले जाओ, और देखाे कि अब कहीं बाईं ओर ताे ज्यादा बाेझ नहीं है. दाेनाें पांवाें काे तराजू के दाे पलड़े बन जाने दाे और अपने सिर काे तराजू का मध्य बिंदु.
 
जब तक तराजू पूरी तरह संतुलित न हाे जाये तब तक बाेझ काे यहां से वहां शिफ्ट करने का खेल खेलते रहाे. एक बिंदु पर जब लगे कि तराजू पूरा संतुलित हाे गया है ताे िफर पूरे प्राणाें से एक निर्णय ले लाे और िफर उसके साथ पूरी तरह ही रहाे.