
बादशाह हुमायूं के प्रिय मंत्री भैरूशा, जो अलवर के श्रावक थे, ने अपने साहस और सूझबूझ से नौ लाख बंदियों की जान बचाई. एक बार हुमायूं के सैनिकों ने सौराष्ट्र पर चढ़ाई की. युद्ध के दौरान नौ लाख लोगों को बंदी बनाया गया और उन्हें खुरासान के गुलामों के बाजार में बेचने का हुक्म दिया गया. बंदी धीरे-धीरे चलने लगे तो उन्हें चाबुक से मारा जाता था. जब ये लोग अलवर गांव के पास पहुंचे, तब वे थक चुके थे. अलवर के जैन संघ को इसकी जानकारी मिली. संघ ने सैनिकों को समझाने का प्रयास किया, लेकिन वे नहीं माने. सैनिकों ने बताया कि यह बादशाह हुमायूं का हुक्म है. भैरूशा हुमायूं के वेिशसनीय व्यक्ति थे. वे तुरंत दिल्ली पहुंचे. सुबह के समय बादशाह हुमायूं ब्रश करते हुए अपनी अंगूठी और राजमुद्रा अपने सेवक को देते थे. भैरूशा के आने पर बादशाह ने राजमुद्रा उन्हें दे दी. भैरूशा ने सोचा कि नौ लाख लोगों की जान बचाने के लिए इसका उपयोग किया जाए. उन्होंने कोरे कागज पर राजमुद्रा की छाप लगाकर लिखा, ङ्गसौराष्ट्र से बंदी बनाए नौ लाख बंदीजनों को मुक्त कर भैरूशा को सौंप दीजिए. यह कागज लेकर भैरूशा अलवर पहुंचे और सेनापति को सौंप दिया. उन्होंने नौ लाख बंदियों को एक-एक स्वर्ण मोहर देकर कहा कि आप मुक्त हैं और बादशाह हुमायूं का जय-जयकार करें. बाद में भैरूशा ने पूरी घटना बादशाह को बताई. उनकी बात सुनकर हुमायूं प्रसन्न हुए और कहा कि ऐसे श्रावकों के कारण जीव रक्षा का धर्म आगे बढ़ता है. - श्रावस्ती जैन संघ, गोलवाला भवन, गुलटेकड़ी, पुणे श्री वर्धमान सांस्कृतिक प्रतिष्ठान में गुरुदेव श्री अभिषेक मुनिजी म. सा. ने रक्षाबंधन के पावन अवसर पर धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि भारतीय संस्कृति में पर्व एवं त्योहार केवल उत्सव मनाने के अवसर नहीं हैं, बल्कि वे अपने भीतर जीवन को दिशा देने वाले महत्वपूर्ण संदेश समेटे हुए हैं. रक्षाबंधन भी ऐसा ही पर्व है, जो हमें प्रेम, वेिशास, संरक्षण और रिश्तों की मर्यादा बनाए रखने की प्रेरणा देता है. प्राचीन संस्कृति में रक्षाबंधन का पर्व विशेष रूप से ब्राह्मणों का पर्व माना जाता था. उस समय धर्म का प्रचार-प्रसार एवं धर्मोपदेश करने का अधिकार ब्राह्मणों को प्राप्त था, इसलिए उन्हें धर्म का रक्षक माना जाता था. इतिहास साक्षी है कि बड़े-बड़े राजा-महाराजा भी अपने राजदरबार में राजगुरु और राजपुरोहित को विशेष सम्मान एवं स्थान प्रदान करते थे. भगवान महावीर के समस्त गणधर ब्राह्मण कुल से थे और भगवान के पास सर्वप्रथम दीक्षा ग्रहण करने वालों में भी ब्राह्मण प्रमुख थे. भगवान महावीर के पश्चात लगभग ढाई हजार वर्षों के जैन इतिहास में अनेक आचार्यों ने ब्राह्मण परिवारों में जन्म लेकर आचार्य पद को सुशोभित किया और जैन धर्म के प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण योगदान दिया. रक्षाबंधन भले ही मुख्य रूप से भाई-बहन के प्रेम और रक्षा का पर्व माना जाता है, लेकिन इसका संदेश प्रत्येक रिश्ते के लिए महत्वपूर्ण है. रिश्तों में कटुता, मनमुटाव या विचारों में मतभेद हो सकते हैं, लेकिन इन कारणों से रिश्तों की डोर तोड़ना उचित नहीं है.