
श्री वर्धमान सांस्कृतिक प्रतिष्ठान में विराजित गुरुदेव श्री अभिषेक मुनिजी ने कहा कि जो जीव को जानता है, वही अजीव को जानता है और जो जीव एवं अजीव दोनों को जानता है, वही संयम का पालन कर सकता है. ज्ञान और दर्शन सदैव साथ-साथ रहते ह्ैं. दर्शन के बिना ज्ञान संभव नहीं है. स्वयं को देखना, आत्मनिरीक्षण करना ही सम्यक् दर्शन है. मूल रूप से जीव और अजीव दो तत्त्व हैं और संपूर्ण संसार इन्हीं दोनों के विस्तार का स्वरूप है. जीव चेतन सत्ता है, जिसमें उपयोग लक्षण विद्यमान है तथा जो सुख-दुःख का कर्ता और भोक्ता है. इसके विपरीत अजीव अचेतन तत्त्व है. जीव जब तक कर्मों से मुक्त नहीं हो जाता, तब तक वह अजीव से पूर्णतः अलग नहीं हो सकता. हमारा संपूर्ण सांसारिक जीवन जीव और अजीव के पारस्परिक संबंध और तालमेल पर आधारित है. जीव और अजीव का संबंध अत्यंत गहरा और घनिष्ठ है. आत्मा के रहने से ही शरीर का महत्व है. आत्मा के बिना शरीर का कोई अर्थ नहीं रह जाता. कर्म भी अजीव का ही एक रूप है और कर्मों के बंधन के कारण जीव संसार में परिभ्रमण करता रहता है. जब कभी हमारे पैर में पत्थर से ठोकर लगती है तो शरीर में वेदना होती है, जबकि पत्थर अपने आप कुछ नहीं करता. अजीव वस्तु जीव के संयोग से प्रभावशाली प्रतीत होती है. हमारा शरीर भी आत्मा के सहयोग से ही शक्ति और सामर्थ्य प्राप्त करता है. इसलिए ज्ञानी पुरुषों ने कहा है कि जहां सम्यक् दर्शन होता है, वहीं सम्यक् ज्ञान का प्रकाश संभव होता है. सम्यक् दर्शन मनुष्य की दृष्टि को बाहरी आकर्षणों से हटाकर आत्मा की ओर ले जाता है और उसे संयम एवं आत्मकल्याण के मार्ग पर अग्रसर करता है.