‌‘महालक्ष्मी‌’आध्यात्मिक पूर्णता की प्रतीक !

    31-Aug-2026
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महालक्ष्मी को सौभाग्य और शुभता का प्रतीक माना जाता है. उनका आशीर्वाद जीवन में सुख और समृद्धि लाता है. यह आध्यात्मिक पूर्णता और दिव्यता का प्रतीक भी है. जैन धर्म में, उन्हें सौंदर्य और दिव्यता का प्रतीक माना जाता है. हर तीर्थंकर की माता को च्यवन (गर्भकाल) के समय चौथा स्वप्न लक्ष्मीजी का आता है और यह अनादि काल से चला आ रहा है. उन सपनों की बोली हम बड़े उल्लास से भगवान के जन्म वांचन के समय मनाते हैं. उस दिन प्राय: लक्ष्मीजी की बोली की ही बड़ी चर्चा रहती है. हर्ष के अतिरेक में हम उस दिन को जन्म कल्याणक जैसा ही मनाते हैं. कारण वह पर्यूषण के दिन होते हैं और सभी धर्म आराधना में डूबे हुए होते हैं. आप को जान कर आश्चर्य होगा कि ‌‘सूरिमंत्र‌’ की पांच पीठ में से तीसरा स्थान श्री महालक्ष्मी का होता है और इसकी आराधना भी आचार्य-भगवंत करते हैं. संघ में हर प्रकार से समृद्धि हो. किसी भी मंत्र में जब श्रीं का प्रयोग होता है तो वह लक्ष्मी प्राप्ति अर्थात सौभाग्य-ऐेशर्य-समृद्धि के लिए ही होता है. जैन धर्म में पहला ज्ञान मति ज्ञान है और व्यावहारिक बुद्धि यह कहती है कि जहां आर्थिक संकट हो, वहां पर मन प्रसन्न नहीं रह सकता और प्रसन्न मन के बिना तीर्थंकरों की भक्ति नहीं हो पाती. कभी जैन मंदिर की प्रतिष्ठा के पूरे महोत्सव को अपनी आंखों से देख लो कि वो कितने ठाठ से मनाया जाता है. हर शिखरबंद मंदिर में या तो उसके प्रवेश द्वार पर या गर्भगृह के ऊपर आपको लक्ष्मीजी की मूर्ति दिखाई देगी.मानो वो अपना आशीर्वाद हम पर ऊपर से बरसा रही हों.
 - साध्वी भव्यगुणाश्रीजी
- साध्वी शीतलगुणाश्रीजी श्री ठाकुरद्वार जैन ेशेताम्बर मूर्तिपूजक संघ, मुंबई