मन का हाेना भी जरूरी है और फिर उसे फेंक भी देना पड़ता है. यदि मन काे फेंक दाे, तभी केवल तुम जानाेगे कि ङ्गमैं ही वह परिपूर्ण शुद्ध ब्रह्म हूँफ. क्याेंकि मन ही है एकमात्र बाधा. मन के कारण ही तुम सीमित हाे, सीमा में हाे.
यह इस प्रकार से है : तुमने रंगीन चश्मा पहना है, ताे यह सारा संसार नीला दिखलाई पड़ता है. यह नीला है नहीं, यह सिर्फ तुम्हारा चश्मा नीला है. तब मैं कहता हूँ, ‘यह संसार नीला नहीं है, अतः अपने चश्मे काे फेंकाे और पुनः संसार काे देखाे.
किन्तु तुम्हें तुम्हारी आँखाें में और चश्मे में अन्तर मालूम नहीं पड़ता. तुम चश्मा पहने हुए ही पैदा हुये थे, इसलिए तुम्हें पता ही नहीं चलता कि कहाँ तुम्हारा चश्मा खत्म हाेता है और ‘मैं’ शुरू हाेता है.’ तुम सदा साेचते रहे कि तुम्हारे चश्मे ही तुम्हारी आँखें हैं. यही एकमात्र समस्या है कि तुम्हारे विचार ही तुम्हारी जिन्दगी हैं. यही समस्या है-तादात्म्य की समस्या.
तुम्हारा विचार ही तुम्हारी जिन्दगी हैं. यही समस्या है. मन चश्मे की तरह है. इसी कारण एक हिन्दू, संसार की ओर एक दूसरी दृष्टि से देखता है और एक मुसलमान दूसरी दृष्टि से देखता है, और एक ईसाई और भी दूसरी तरह से देखता है क्याेंकि उनके चश्मे भिन्न-भिन्न है. अपने चश्में फेंक दाे, और तब पहली बार तुम्हें अपनी आँखें फिर से मिलेंगी. भारत में हमने इसे दर्शन कहा. यह आँखाें काे पुनः पा जाना है.
हमारे पास आँखें हैं, किन्तु ढकी हैं.
हम उसी तरह से संसार में चल रहे हैं, जैसे तांगे के आगे लगे हुये घाेड़े चलते हैं. उनकी आँखाें के दाेनाें तरफ परदा लगा दिया जाता है. उन्हें सिर्फ सामने ही देखना चाहिये क्याेंकि यदि घाेड़े ने चाराें ओर इधर-उधर देखना शुरू किया ताे चालक के लिये कठिनाई खड़ी हाे जायेगी. तब वह इधर-उधर कहीं भी दाैड़ने लगेगा. इसलिए घाेड़े काे सिर्फ सामने ही देखने दिया जाता है ताकि उसका संसार सीधी रेखा में हाे.
इससे उसका संसार तीन आयामी नहीं रहता है, वह सब ओर नहीं देख सकता.
सारा अस्तित्व खाे जाता है सिवा बाजार के. और वह एक मृत बाजार है क्याेंकि बाजार जिन्दा नहीं हाे सकते. वह सिर्फ एक मुर्दा बाजार है, मुर्दा सड़क है.
घाेड़े सिर्फ सड़क देख सकते हैं, यह उपयाेगिता की बात है. आदमी ने भी अपने काे ऐसे ही ढाल दिया है, उपयाेगिता के मार्ग पर निर्मित कर लिया है. मन के साथ जीना एक उपयाेगिता की बात है न कि जीवन के साथ जीना, क्याेंकि जीवन बहुआयामी है. काेई नहीं जानता कि वह तुम्हें कहाँ ले जायेगा. अतः एक पक्की सड़क बनाओ. अपनी आँखाें काे बन्द कर लाे, पक्के चश्मे चढ़ा लाे और फिर सड़क पर चलाे. लेकिन तुम जा कहाँ रहे हाे? यह सड़क सदैव मृत्यु की ओर ले जाती है, और ताे यह कहीं भी नहीं जाती. यह माैत का रास्ता है. ऐसा कहा जाता है कि हर एक सड़क राेम जाती है, लेकिन यह सत्य तभी हाे सकता है यदि राेम का अर्थ मृत्यु हाेता हाे, वरना यह सत्य नहीं हाे सकता.
हर एक सड़क मृत्यु काे पहुँचाती है.
यदि तुम्हें जीवन चाहिये, ताे फिर जीवन के लिये काेई सड़क तय नहीं है. जीवन ताे यहीं और अभी है, बहु-आयामी, चाराें तरफ फैला. यदि तुम्हें जीवन में गति करना है, ताे अपने चश्मे उतार फेंकाे, अपनी धारणाओं काे छाेड़ाे. अपने विधि-विधानाें, अपने विचाराें, अपने मन काे त्यागाे. जीवन में जन्म लाे अभी और यहीं, इस बहुआयामी जीवन में, जाे कि चाराें ओर फैला है, तब तुम केन्द्र बनाेगे और सारा जीवन तुम्हारा हाेगा, न कि एक खास सड़क्. तब यह सारा जीवन तुम्हारा हाेगा. जाे भी इसमें हाेगा, वह सब तुम्हारा ही हाेगा.
यही जानना है, बाेध है : कि मैं ही वह परिपूर्ण शुद्ध ब्रह्म हूँ. तुम किसी और सड़क से उस ब्रह्म काे नहीं पहुँच सकते.
वह मार्ग, मार्ग-विहीन है. यदि तुम एक मार्ग का अनुगमन कराे, ताे तुम किसी चीज़ पर पहुँचाेगे किन्तु वह सब कुछ नहीं हाेगा. कैसे एक मार्ग तुम्हें सर्व पर पहुँचा देगा? एक मार्ग तुम्हें किसी एक चीज़ पर पहुँचायेगा, किन्तु सर्व पर नहीं. यदि तुम्हें सब कुछ चाहिये, ताे सारे मार्गाें काे छाेड़ाे, अपनी आँखें खाेलाे, और चाराें ओर देखाे.सर्व यहाँ उपस्थित है. इसे देखाे और इसमें पिघलाे क्याेंकि पिघलना ही तुम्हें एकमात्र ज्ञान, बाेध प्रदान करेगा. पिघलाे उसमें, डूबाे उसमें.