कोथरुड, 30 अगस्त (आ.प्र.) संस्कृत केवल देवभाषा ही नहीं, बल्कि भारतीय ज्ञान-परंपरा का संवहन करने वाली एक समृद्ध ज्ञान- भाषा है. संस्कृत भाषा के संरक्षण और व्यापक प्रसार के लिए समाज में अधिक प्रभावी जनजागरूकता की आवश्यकता है, यह विचार सावित्रीबाई फुले पुणे वेिशविद्यालय के संस्कृत व प्राकृत भाषा विभाग के प्रो. डॉ. दिनेश रसाल ने व्यक्त किए. एमआईटी वर्ल्ड पीस यूनिवर्सिटी के सेंटर फॉर संस्कृत एंड इंडियन नॉलेज सिस्टम्स की ओर से आयोजित संस्कृत दिवस कार्यक्रम में वे मुख्य अतिथि के रूप में वे बोल रहे थे. इस अवसर पर एमआईटी डब्ल्यूपीयू के कुलपति प्रो. डॉ. दत्ता दांडगे, वरिष्ठ सलाहकार डॉ. संजय उपाध्ये, डॉ. विष्णु भिसे, संस्कृत भारती (पुणे) प्रांत के प्रो. पै, पीस स्टडीज विभाग के डॉ. भागवत, सेंटर के समन्वयक डॉ. संदीप ढिकले समेत गणमान्य उपस्थित थे. यह कार्यक्रम एमआईटी के संस्थापक वेिशधर्मी प्रो. डॉ. वेिशनाथ कराड के आशीर्वाद और एमआईटी डब्ल्यूपीयू के कार्यकारी अध्यक्ष डॉ. राहुल कराड के मार्गदर्शन में संपन्न हुआ.डॉ. रसाल ने कहा, संस्कृत का प्रभाव केवल भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि दक्षिण-पूर्व एशिया (इंडोनेशिया, कंबोडिया) और मध्य एशिया तक फैला है. संक्षेप में, संस्कृत केवल एक भाषा नहीं, बल्कि भारत के ज्ञान, संस्कृति और दर्शन की जीवंत विरासत है. डॉ. संजय उपाध्ये ने कहा, भाषा का सदुपयोग केवल संवाद तक सीमित न रहे, बल्कि छात्रों के साथ जुड़ने और उनमें मूल्य-संवर्धन के प्रभावी माध्यम के रूप में हो. संस्कृत का अध्ययन, उपयोग व साधना का लोकतंत्रीकरण हो कुलपति प्रो. डॉ. दत्ता दांडगे ने कहा, वेिशविद्यालय ने स्थापना से ही मूल्य-आधारित शिक्षा और भारतीय ज्ञान-परंपरा के संरक्षण, संवर्धन व प्रसार को विशेष प्राथमिकता दी है. आधुनिक शिक्षा को भारतीय संस्कृति, अध्यात्म और प्राचीन ज्ञान-परंपरा से जोड़ना एमआईटी डब्ल्यूपीयू की विशिष्ट शैक्षणिक परंपरा है. संस्कृत का केवल प्रचार नहीं, बल्कि उसके अध्ययन, उपयोग और साधना का लोकतंत्रीकरण होना चाहिए. एमआईटी का संस्कृत और आईकेएस सेंटर इसमें महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है.