कोथरुड़, 3 अगस्त (आ.प्र.) पुणे के कोथरुड़ में मयूर कॉलोनी में स्थित श्री वर्धमान सांस्कृतिक प्रतिष्ठान के तत्वावधान में विराजित गुरु सुमति शिष्य उपप्रवर्तक, तप दिवाकर गुरुदेव श्री अभिषेक मुनि जी ने सोमवार (3 अगस्त) को कहा कि, अरिहंत भगवंतों की पावन वाणी संत महापुरुषों के माध्यम से जन मानस तक पहुंच रही है. ज्ञानीजनों ने कहा है श्रद्धा-भक्ति-आस्था से भगवान की स्तुति, प्रार्थना करते हुए 750 भजन गाने से जो लाभ मिलता है, उतना लाभ आगम की एक गाथा का स्वाध्याय करने से मिलता है. उसी पावन वाणी में धर्म की महिमा को बताते हुए अरिहंत भगवन्तों ने कहा है कि, धर्म उत्कृष्ट मंगल है. धर्म में अहिंसा, संयम व तप शामिल है. अहिंसा के स्वरूप को बतलाते हुए गुरुदेव ने कहा कि, द्रव्य हिंसा से भी अधिक खतरनाक भाव हिंसा है. द्रव्य हिंसा दिखाई देती है पर भाव हिंसा दिखती नहीं है; परंतु आत्मा का अहित करती है. किसी को शारीरिक पीड़ा देना द्रव्य हिंसा है तो किसी के लिए मन में अहित चिंतन करना भाव हिंसा है. किसी विचारक ने तो जैन दर्शन की महिमा को बताते हुए कहा है कि सब धर्मों की अहिंसा जहां समाप्त होती है, वही से जैन धर्म की अहिंसा शुरू होती है. अहिंसा की इतनी सूक्ष्म व्याख्या अन्यत्र कहीं उपलब्ध नहीं होती. शास्त्र स्वाध्याय का महत्व बताते हुए गुरुदेव ने कहा कि अरिहंत भगवंतों की समझ आये ना आए, पर पठन पाठन करना चाहिए, क्योंकि डॉक्टर की दवा समझ आए ना आए, पर रोग का निवारण करती ही है. ठीक उसी प्रकार प्रभु वाणी पढ़ने सुनने से कर्मों की निर्जरा होती ही है. उपप्रवर्तक श्री आशीष मुनि जी ने भी वर्तमान में युवा पीढ़ी की स्थिति को बताते हुए कहा कि आज हम पूरी तरह से डिजिटल चीजों पर निर्भर हो गए हैं. बिना मोबाइल के जीवन अंगहीन प्रतीत होता है. उन्होंने बताया कि, पापी कितना भी छुप कर पाप करे, फिर भी उसके मन में सदा डर बना ही रहता है.
स्वयं पर नियंत्रण हो तभी अहिंसा का पालन होगा भगवान महावीर स्वामी जी ने तो आज से ढाई हजार साल पहले ही कहा था कि पृथ्वी, पानी, वायु, वनस्पति में जीव होते है जिसे वर्तमान वैज्ञानिक प्रमाणित कर रहे हैं. यदि अहिंसा का पालन करना है तो संयम को जीवन में लाना होगा क्योंकि अहिंसा की पालना तभी हो सकती है जब स्वयं पर नियंत्रण हो. आत्म-नियंत्रण के बिना तप करना भी संभव नहीं है. बिना मन को साधे जीवन में धर्म आराधना नहीं हो सकती और मन को साधने और जीवन को मोक्ष की अग्रसर करने के लिए परमात्मा ने साधु और श्रावक धर्म का प्रारूप बताया है.