ध्यान रहे, हमारा जीवन वैसा है, जैसी हमारी दृष्टि है

    04-Aug-2026
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Osho 
जीवन में न ताे दुख है और न सुख. जीवन काे ताे जैसा हम देखने में समर्थ हाे जाते हैं, वैसा ही हाे जाता है. जीवन ताे वैसा ही है जैसी देखने की हमारे पास दृष्टि हाेती है. हमारे ही बीच इसी जीवन में वे लाेग भी जीते है जाे आनंद से भरे हाेते हैं, और वे लाेग भी जाे दुख और अंधकार से. जीवन यही हैं, देखने की दृष्टियां भिन्न हाेती हैं. अगर हमनें जीवन में उदासी और अंधकार और दुख और पीड़ा काे ही देखने की दृष्टि काे अर्जित कर लिया हाे ताे जीवन के आनंद से हम वंचित रह जाएं ताे काेई आश्चर्य नहीं है.
 
मैंने सुना है, एक मां अपने बच्चे से परेशान थी. वह किसी भी तरह के भाेजन में काेई रूचि न लेता था. और हर तरह के भाेजन में कुछ न कुछ आलाेचना, शिकायत खड़ी कर देता था.
 
वह किसी तरह के वस्त्राें में भी काेई रूचि न लेता था, और हर तरह के वस्त्राें में काेई न काेई भूल-चूक खाेज लेता था.
वह किन्हीं मित्राें में भी काेई रूचि न लेता था, और हर मित्र में काेई न काेई खराबी खाेज लेता था. उसकी मां घबरा गई.
उसका भविष्य सुखद न था. जिसकी दृष्टि हर जगह भूल ही और अंधकारपूर्ण पक्ष काे खाेज लेने की हाे उसका जीवन नरक हाे जाएगा.
 
वह घबराई, उसे एक मनाेवैज्ञानिक के पास ले गई. सबसे बड़ा प्रश्न ताे उसके भाेजन का था. क्याेंकि वह भाेजन करना ही बंद कर दिया था. हर चीज में-दूध में उसे बास आती थी, राेटियां उसे पसंद न थी; इस चीज में यह खराबी थी, उस चीज में वह खराबी थी. और सब ताे ठीक था, लेकिन भाेजन के बिना ताे जीना भी कठिन है. वह एक बड़े मनाेवैज्ञानिक के पास ले गई.
 
उस मनाेवैज्ञानिक की बड़ी ख्याति थी. वह न मालूम कैसेकैसे विक्षिप्त लाेगाें काे भी ठीक कर चुका था. यह ताे एक छाेटा सा बच्चा था, अभी जीवन की शुरुआत थी. इसे ठीक करने में काैन सी कठिनाई हाेने वाली थी. उस मनाेवैज्ञानिक ने उस बच्चे काे बहुत तरह से समझाया. भाेजन की खूबियां समझाई, ायदे समझाए, बहुत अच्छी-अच्छी मिठाइयां बुलवाई, उस बच्चे के सामने रखीं, लेकिन उसने काेई न काेई आलाेचना निकाल दी. आलाेचक था जन्मजात, उसने काेई न काेई बात निकाल दी कि इसमें ये भूल है, इसका रंग मुझे पसंद नहीं है, इसकी बास मुझे पसंद नहीं. इसे खाऊंगा ताे वमन हाे जाएगा