सबसे बड़ा मित्र मन : श्री अभिषेक मुनिजी

    05-Aug-2026
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कोथरुड़, 4 अगस्त (आ. प्र.)

पुणे के कोथरुड़ में मयूर कॉलोनी में स्थित श्री वर्धमान सांस्कृतिक प्रतिष्ठान के तत्वावधान में विराजित गुरु सुमति शिष्य उपप्रवर्तक, तप दिवाकर गुरुदेव श्री अभिषेक मुनि जी ने प्रवचन में कहा कि, प्रवचन सुनना एवं सुनाना स्वाध्याय का एक महत्त्वपूर्ण भेद है. जैन संस्कृति में प्रवचन एवं धर्मकथा सुनना-सुनाना प्राचीन एवं प्रमुख परंपरा रही है, जिसके माध्यम से प्रभु-वाणी का स्वाध्याय होता है. प्रभु-वाणी में धर्म को उत्कृष्ट मंगल कहा गया है. अहिंसा, संयम एवं तप रूपी धर्म जिसके मन में निवास करता है, उसे देवता भी नमस्कार करते हैं. जिनशासन में सामायिक आत्मोत्थान एवं आत्मशुद्धि की अनमोल साधना है. साधु की सामायिक जीवनपर्यंत रहती है, जबकि श्रावक की सामायिक 48 मिनट की होती है. यह साधना आत्मा को समता, संयम एवं शुद्धि की ओर अग्रसर करती है. मन, वचन एवं काया-इन तीनों के माध्यम से कर्मों का बंध होता है, किंतु सर्वाधिक कर्मबंध मन के द्वारा होता है. काया दिखाई देती है, वाणी सुनाई देती है, परंतु मन न दिखाई देता है और न सुनाई देता है, फिर भी सबसे अधिक कर्मों का बंध उसी से होता है. गुरुदेव ने आगे बताया कि, मन साधना का प्रमुख आधार है. जब तक जीव को मन की प्राप्ति नहीं होती, तब तक उसके धर्मजीवन की वास्तविक शुरुआत भी नहीं होती. यदि मन अनुकूल हो तो उससे बड़ा कोई मित्र नहीं और यदि मन प्रतिकूल हो जाए तो उससे बड़ा कोई शत्रु भी नहीं. धर्मसभा को संबोधित करते हुए उपप्रवर्तक श्री आशीष मुनिजी म. सा. ने कहा कि, हम अपने कदमों को तो देख लेते हैं, पर अपने मन को नहीं देखते. जिसने अपने मन को देख लिया, उसे जान लिया और नियंत्रित कर लिया, वह संसार में भटकने के मार्ग को बंद कर देता है.