मन को जीतना मोक्ष की दिशा में पहला कदम : अभिषेक मुनिजी

    06-Aug-2026
Total Views |

bgvf

कोथरुड, 5 अगस्त (आ.प्र.)

श्री वर्धमान सांस्कृतिक प्रतिष्ठान, कोथरुड के तत्वावधान में विराजित गुरु सुमति शिष्य उपप्रवर्तक तप दिवाकर गुरुदेव श्री अभिषेक मुनिजी म. सा. ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि, जिसके मन में अहिंसा, संयम एवं तपरूपी धर्म का वास होता है, देवता भी उसे नमस्कार करते हैं. शस्त्रों में वाणी या काया की अपेक्षा मन को अधिक महत्व दिया गया है, क्योंकि सर्वाधिक कर्मों का बंधन तथा कर्मों की निर्जरा मन के माध्यम से ही होती है. अर्धमगधी एवं प्राकृत भाषा में मन के लिए ‌‘मण‌’ शब्द का प्रयोग किया गया है. इस चंचल मन को वश में करना अत्यंत कठिन साधना है. मन को नियंत्रित करने के लिए लगभग चालीस सिंहों को वश में करने जितनी शक्ति और पुरुषार्थ की आवश्यकता होती है. प्रत्येक साधक का परम लक्ष्य अपनी जीवात्मा को मोक्ष तक पहुंचाना है. इसी उद्देश्य की प्राप्ति के लिए धर्म, साधना और आत्मचिंतन आवश्यक हैं. गुरुदेव ने भगवान महावीर की अंतिम देशना (प्रवचन) श्रीमद्‌‍ उत्तराध्ययन सूत्र का उल्लेख करते हुए बताया कि भगवान पार्श्वनाथ परंपरा के आचार्य श्री केशी श्रमण ने भगवान महावीर के प्रथम गणधर इंद्रभूति गौतम स्वामी से प्रश्न किया था कि- मन को वश में करने का उपाय क्या है. समाधान स्वरूप बताया गया कि ज्ञान, वैराग्य एवं निरंतर अभ्यास के माध्यम से मन पर विजय प्राप्त की जा सकती है. इस अवसर पर गुरु हेम शिष्य उपप्रवर्तक श्री आशीष मुनिजी ने कहा, आज की पीढ़ी के तनाव का सबसे बड़ा कारण धैर्य का अभाव है. यदि उनके जीवन में धैर्य आ जाए तो वो सब कुछ प्राप्त कर सकतें है पर उनको जो चाहिये वो ही चाहिए. उन्होंने कहा व्यक्ति पुण्य बताकर करता है और पाप छिपा करता है, व्यक्ति थोड़ा सा भी पुण्य करता है तो जिसको नहीं बताना उसको भी जाकर बताता है.