हमारी चिंता, मनुष्य की चिंता का मूल आधार यही है कि जाे रुक नहीं सकता, उसे हम राेकना चाहते हैं. जाे बंध नहीं सकता, उसे हम बाधना चाहते हैं. जाे बच नहीं सकता, उसे हम बचाना चाहते हैं. मृत्यु जिसका स्वभाव है, उसे हम अमृत देना चाहते हैं. बस, िफर हम चिंता में पड़ते हैं. एंग्जाइटी, चिंता यही है कि मैं जिसे प्रेम करता हूं वह प्रेम कल भी ठहरेगा या नहीं! कल जिसे मैंने प्रेम किया था, वह आज बचा है कि नहीं बचा! कल जिसने मुझे आदर दिया था, वह आज भी मुझे आदर देगा कि नहीं देगा! कल जिन्हाेंने मुझे भला माना था, वे आज भी मुझे भला मानेंगे कि नहीं मानेंगे! बस, चिंता यही है.इसलिए जब-जब दुनिया में पदार्थवाद का आग्रह बढ़ जाता है, ताे चिंता बढ़ जाती है. पश्चिम अगर आज ज्यादा चिंतित है पूरब की बजाय, ताे उसका और काेई कारण नहीं है.
पूरब में परेशानी ज्यादा है भूख है, गरीबी है, अकाल है, बाढ़ है, सब है. पश्चिम में अकाल भी खाे गया, बीमारी भी कम हाे गई, उम्र भी लंबी मालूम पड़ती है, धन भी ज्यादा है, सुविधा भी है स्वास्थ्य भी है, लेकिन चिंता ज्यादा है. हाेना ताे यही चाहिए था कि पश्चिम में चिंता कम हाे जाती, पूरब में चिंता ज्यादा हाेती.
गणित से ताे यही लगता है कि ऐसा हाेना चाहिए था. भुखमरी नहीं रही, बीमारी नहीं रही, सुविधा हाे गई. काेई आदमी काम न करे, ताे भी जी सकता है.
बीस-पच्चीस साल बाद पश्चिम में काेई काम नहीं करेगा, क्याेंकि सारे यंत्र आटाेमेटिक हुए चले जाते हैं. और प्रत्येक मुल्क, जहां आटाेमेटिक यंत्र काम करने लगेंगे, अपने विधान में यह नियम बना लेगा, जैसा हम कहते हैं कि स्वतंत्रता व्यक्ति का जन्मसिद्ध अधिकार है, ठीक बीस साल के भीतर पश्चिम के विधानाें में, कांस्टीट्यूशंस में यह सूत्र आ जाएगा कि धन प्राप्त करना प्रत्येक व्यक्ति का जन्मसिद्ध अधिकार है बिना श्रम के. ताे जन्मसिद्ध अधिकार हाेना भी चाहिए! जब धन बहुत हाेगा, ताे उसका क्या मतलब है? और जब धन मशीनें पैदा कर देंगी, ताे आदमी बिना श्रम के धन पा सके, यह उसका जन्मसिद्ध अधिकार हाे जाने वाला है.लेकिन चिंता बढ़ती चली जाती है. और मैं मानता हूं जिस दिन मशीनें सारा काम ले लेंगी, उस दिन आदमी इस मुश्किल में पड़ जाएगा - कम से कम पश्चिम में कि उस आदमी काे बचाना मुश्किल हाे जाएगा. कारण क्या है? कारण एक है कि पश्चिम की दृष्टि पदार्थ पर है, और वह साेचता है कि पदार्थ के जगत में स्थिरता मिल जाए. वह स्थिरता मिल नहीं सकती.