कोथरुड़, 6 अगस्त (आ. प्र.) पुणे के कोथरुड़ में मयूर कॉलोनी में स्थित श्री वर्धमान सांस्कृतिक प्रतिष्ठान के तत्वावधान में विराजित गुरु सुमति शिष्य उपप्रवर्तक, तप दिवाकर गुरुदेव श्री अभिषेक मुनि जी ने प्रवचन में कहा कि, जीवात्मा की यात्रा अनादि-अनंत काल से निरंतर चल रही है. अनंत काल तक आत्मा निगोद अवस्था में रहती है. सिद्ध आत्माओं का महान उपकार है कि जब एक आत्मा सिद्ध होती है, तभी अन्य जीवात्माओं के विकास का क्रम प्रारम्भ होता है. गुरुदेव ने बताया कि जीव असंख्य काल तक स्थावर एकेंद्रिय अर्थात पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु एवं वनस्पति रूप में भ्रमण करता है. इसके पश्चात क्रमशः बेइंद्रिय,तेइंद्रिय, चौरिंद्रीय तथा तिर्यंच पंचेंद्रिय योनियों से गुजरते हुए अत्यंत दुर्लभ मनुष्य भव की प्राप्ति होती है. उन्होंने कहा कि, असंख्यात काल तक विभिन्न योनियों में भटकने के बाद देवताओं को भी दुर्लभ मनुष्य जन्म सहज उपलब्ध नहीं होता. वास्तव में वही पुण्यवान हैं जो 84 लाख योनियों में भटकने के पश्चात प्राप्त इस दुर्लभ मनुष्य भव का मूल्य समझते हैं. अधिकांश लोग अनंतकाल के बाद मिले इस अमूल्य अवसर की महत्ता को नहीं पहचान पाते. जीवन की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि, जो हमारे पास नहीं है, उसे पाने की लालसा बनी रहती है, जबकि जो अमूल्य प्राप्त है उसका सम्मान नहीं कर पाते. गुरुदेव ने कहा कि अधिकांश मनुष्य यह विचार ही नहीं करते कि वे जीवन क्यों जी रहे हैं, उनके जीवन का लक्ष्य और उद्देश्य क्या है. अनेक जन्म बीत जाते हैं, फिर भी जीवन की गुत्थी को सुलझाया नहीं जा सकता. अरिहंत परमात्मा की अनंत कृपा है कि हमें ऐसा जिनशासन प्राप्त हुआ है, जो आत्मा से परमात्मा बनने का दिव्य मार्ग प्रदान करता है. उन्होंने सभी से आत्मशुद्धि, आत्मजागरण एवं धर्म आराधना के माध्यम से जीवन को सार्थक बनाने का आह्वान किया.
मनुष्य को स्वयं श्रेष्ठ बनने का लगातार प्रयास करना चाहिए उपप्रवर्तक, तपस्विराज श्री आशीष मुनि जी म. सा. ने कहा कि, शरीर को थोड़ा-सा कष्ट भी हो तो हम व्याकुल हो जाते हैं, किंतु आत्मा को होने वाले कष्टों की ओर हमारा ध्यान नहीं जाता. अपने अंतःकरण में भरे क्रोध, मान, माया और लोभ रूपी मलिनताओं को दूर करने का प्रयास नहीं करते. आज का मनुष्य दूसरों की बराबरी करने में ही जीवन व्यतीत कर देता है, जबकि उसे स्वयं को श्रेष्ठ बनाने और आगे बढ़ने का प्रयास करना चाहिए.