सोशल मीडिया पर साझा हो रही एक कहानी आज के बुजुर्गों के अकेलेपन की गंभीर समस्या को सामने लाती है. एक बुजुर्ग महिला ने ऑनलाइन खाना केवल इसलिए मंगवाया, क्योंकि उन्हें किसी से कुछ देर बात करनी थी. उनके बच्चे विदेश में रहते थे और आर्थिक रूप से वे सक्षम थीं, लेकिन उन्हें सबसे अधिक जरूरत साथ और इस एहसास की थी कि उनका अस्तित्व आज भी किसी के लिए महत्वपूर्ण है. यह स्थिति अब केवल संपन्न परिवारों तक सीमित नहीं है. शहरों, गांवों और झुग्गी-बस्तियों में रहने वाले लाखों बुजुर्ग अकेलेपन, स्वास्थ्य समस्याओं और सामाजिक उपेक्षा का सामना कर रहे हैं. भारत में 60 वर्ष से अधिक आयु के लगभग 8 प्रतिशत बुजुर्ग अकेले रहते हैं. गरीब और वंचित वर्ग के अनेक बुजुर्ग बीमारी, शारीरिक अक्षमता, आर्थिक अभाव और दैनिक जरूरतों के लिए दूसरों पर निर्भर हैं. कई बार उन्हें भोजन, दवाइयों, अस्पताल ले जाने या रोजमर्रा के कामों में सहायता तक उपलब्ध नहीं होती. अकेलेपन का असर मानसिक स्वास्थ्य पर भी पड़ता है. बातचीत और भावनात्मक सहारे के अभाव में बुजुर्ग अवसाद, निराशा और असुरक्षा से घिर सकते हैं. ऐसे में उन्हें केवल चिकित्सा नहीं, बल्कि किसी ऐसे व्यक्ति की आवश्यकता है जो उनकी बातें सुने, भावनाओं को समझे और सम्मान दे. प्रशिक्षित वृद्ध देखभालकर्ता यह भूमिका प्रभावी ढंग से निभा सकते हैं. समाधान केवल वृद्धाश्रम नहीं है. अधिकांश बुजुर्ग अपने घर और समुदाय में ही सुरक्षित और सम्मानजनक जीवन चाहते हैं. इसलिए समुदाय-आधारित समग्र वृद्ध देखभाल आवश्यक है. इसी सोच के साथ स्कूल (Society of Community Health Oriented Operational Links) के मुख्य कार्यकारी अधिकारी डॉ. बेनजीर पाटिल (मुख्य संचालन अधिकारी) डॉ. पवन पाठक और मुख्य रणनीति अधिकारी डॉ. राहुल सिंह भदौरिया ने वृद्धमित्र की अवधारणा विकसित की है.
इलाज के साथ ही मान-सम्मान मिलना जरूरी
वृद्धमित्र बुजुर्गों की स्वास्थ्य, सामाजिक और भावनात्मक जरूरतों का आकलन कर उन्हें आवश्यक सेवाओं से जोड़ता है. स्कूल संस्था ने नीति आयोग के साथ वरिष्ठ नागरिकों की देखभाल के लिए मानव संसाधन विषय पर राष्ट्रीय चर्चा भी शुरू की है. भारत तेजी से वृद्ध समाज की ओर बढ़ रहा है. इसलिए सरकार, CSR क्षेत्र, सामाजिक संस्थाओं और समुदाय को मिलकर ऐसी व्यवस्था बनानी होगी, जिसमें हर बुजुर्ग को इलाज के साथ सहारा, सम्मान और नियमित देखभाल मिले. वृद्धों की देखभाल दया नहीं, बल्कि गरिमापूर्ण जीवन के अधिकार का प्रश्न है. - डॉ. पवन पाठक, मुख्य संचालन अधिकारी, स्कूल