कोथरुड़, 31 अगस्त (आ. प्र.) श्री वर्धमान सांस्कृतिक प्रतिष्ठान में विराजित गुरुदेव श्री अभिषेक मुनिजी ने कहा कि, संसार में जब तक जीव, अजीव आदि तत्त्वों का यथार्थ ज्ञान नहीं होता, तब तक सम्यक् दर्शन की दिशा में आगे बढ़ना कठिन है. यही कारण है कि अरिहंत भगवंतों ने ज्ञान और दर्शन को अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान प्रदान किया है. विज्ञान में जितनी जानकारी, खोज और शोध प्रमाणित हो जाती है, वैज्ञानिक उतना ही वेिशास करते हैं. वे प्रमाण के आधार पर अपनी मान्यता बनाते हैं और प्रमाण से आगे बढ़कर वेिशास नहीं करते. वहीं धर्म का मार्ग श्रद्धा और वेिशास पर आगे बढ़ता है. धर्म में जानकारी सीमित हो सकती है, लेकिन यदि श्रद्धा गहरी, दृढ़ और अटूट है तो जीव आध्यात्मिक उन्नति की दिशा में बहुत आगे बढ़ सकता है. आचार्य भगवंतों ने इसी दृढ़ श्रद्धा को सम्यक् दर्शन का स्वरूप बताया है. दुनिया हमारे ज्ञान से पहले हमारे आचरण को देखती है. ज्ञान का परिचय चर्चा के माध्यम से होता है, श्रद्धा व्यक्ति के अंतर्मन का विषय है, लेकिन हमारा व्यवहार, बोलचाल, आचरण और हमारी संगति हमारे चरित्र को प्रकट करती है, इसलिए व्यक्ति के व्यक्तित्व में चरित्र का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है. चरित्र का महत्व आंतरिक और व्यावहारिक-दोनों ही क्षेत्रों में है. व्यक्ति के सामने अक्सर यह प्रश्न रहता है कि क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए. चरित्र का सीधा संबंध हमारे भावों से होता है. जैसे हमारे अंतर्मन के भाव होते हैं, वैसा ही हमारा आचरण और चरित्र बनता चला जाता है. जब भाव विशुद्ध होते हैं तो चरित्र भी विशुद्ध होता है और जब चरित्र निर्मल होता है तो जीवन स्वतः धर्म, संयम और आत्म-कल्याण की दिशा में अग्रसर होने लगता है.