जीवन में जाे भी गति है, जाे भी विकास है, जाे भी ऊंचाइयाें का स्पर्श है, वह सब दुस्साहस से आता है. दुस्साहस का अर्थ है असुरक्षा काे आमंत्रण, अपरिचित और अज्ञात से प्रेम जाेखिम का आनंद. खतरे उठाने की और खतराें से प्रेम करने की जिसकी तैयारी नहीं है, वह जीता है लेकिन जीवन काे नहीं पाता है और सबसे बड़ा दुस्साहस क्या है? परमात्मा की दिशा से अधिक असुरिक्षत और काैन सी दिशा है? क्याेंकि, परमात्मा से अधिक अपरिचित, अज्ञात और अज्ञेय क्या है? क्याेंकि परमात्मा की खाेज से बड़ा दांव, जुआ और जाेखिम काैन सी है? इससे मैं कहता हूं कि दुस्साहस सबसे बड़ा धार्मिक गुण है. जिसमें दुस्साहस नहीं है, वह धर्म के लिए नहीं है, और धर्म उसके लिए नहीं है. सत्यानुभूति न ताे विचार है न हीं भावना. वह ताे समस्त प्राणाें काे-तुम्हारी सत्ता का आंदाेलित और स्पंदित हाे उठना है. वह तुम में नहीं हाेती, तुम ही उसमें हाेते हाे. वह ताे तुम्हारा स्वरूप है. वह अनुभव हीं नहीं, स्वयं तुम ही हाे और मात्र तुम ही नहीं हाे. तुमसे भी ज्यादा वह है क्याेंकि उसमें सर्व की सत्ता भी समाहित है.
क्या तुम इतने दरिद्र हाे कि धर्म भी तुम्हारे पास नहीं? धन की दरिद्रता बहुत बड़ी नहीं है. असली दरिद्रता ताे धर्म की दरिद्रता है. धन रहते भी लाेग दरिद्र बने रहते हैं लेकिन जिसके पास धर्म की संपदा हाेती है, उसकी दरिद्रता सदा सदा के लिए नष्ट हाे जाती है. मनुष्य के जीवन में-पूरी मनुष्यता के जीवन में भी सबसे बड़ी घटना उसकी आधिभाैतिक सफलताएं या साम्राज्याें का निर्माण नहीं है, बल्कि उस संपदा की खाेज और उपलब्धि है जाे कि उसके ही भीतर छिपी है.
उस संपदा काे ही मैं धर्म कहता हूं. जाे संपदा बाहर है, वह धन है और जाे संपदा भीतर, है, वह धर्म है. धन काे चुनने वाले अंततः दरिद्रता काे, और धर्म काे चुनने वाले अंततः वास्तविक धन काे चुनने वाले सिद्ध हाेते हैं.
एक घर में गया था. वहां वीणा रखी थी. मैंने कहा मनुष्य का मन भी वीणा की भांति है. वह ताे साधन है. उससे संगीत और विसंगति दाेनाें ही पैदा हाे सकते हैं और जाे भी हम उससे पैदा करेंगे, उसकी जिम्मेदारी हमारे अतिरिक्त और किसी पर नहीं हाेगी. अपने मन काे संगीत का साधन बनाएं और सत्य का. उसे स्वतंत्र रखें और सच्चा. और अहंकार से मुक्त रखें क्याेंकि अहंकार से अधिक विसंगति पैदा करने वाला कुछ और नहीं है. जाे स्वयं के भीतर संगीतपूर्ण हाेता हैः मात्र बुद्धिमान नहीं बल्कि समग्ररूपेण जिसका व्यक्तित्व संगीतपूर्ण है, वही सत्य के सर्वाधिक निकट पहुंचता है. मैं तुम्हें मंत्राें काे दाेहराते देखता हूं, कंठस्थ शब्दाें और शास्त्राें की पुनरूक्ति करते देखता हूं ताे मेरा हृदय दया और सहानुभूति से भर जाता है. यह तुम क्या कर रहे हाे? क्या अपने काे भुलाने और विस्मरण करने और आत्म सम्माेहन के द्वारा निद्रा में जाने काे ही तुमने धर्म और साधना समझ लिया है? निश्चय ही मंत्राें का उच्चार और शब्दाें का जप चित्त काे सुखद निद्रा में सुलाने में समर्थ है लेकिन निद्रा काे समाधि मत समझ लेना. मित्र, सुषुप्ति और समाधि में बहुत भेद है.
आत्म सम्माेहन जनित सुषुप्ति में अनुभव भी घटित हाेते हैं. लेकिन वे सब स्वप्नाें से ज्यादा नहीं है और उन्हें हमारा मन ही प्रक्षेपित करता है. िफर ये स्वप्न चाहे कितने ही सुखद और संतुष्टिदायीं हाें, सुख और संताेष के कारण वे सत्य नहीं हाे जाते हैं. पर साधारणतः हम सत्य काे नहीं, संताेष काे ही खाेजते हैं और इसलिए किसी भी भ्रम में हमारा उलझ जाना बहुत आसान है. संताेष काे खाेजने वाला मन किसी भी रूप से पैदा हुई मादकता से तृप्त हाे सकता है... किसी भी भांति का आत्म-विस्मरण उसे तृप्ति दे सकता है. और तथाकथित मंत्र, जप और एकाग्रताओं के द्वारा आत्मविस्मरण संभव हाे जाता है. किसी भी भ्रांति की सतत पुनरूक्ति चेतना काे मूर्च्छित करती है. जब कि धर्म का संबंध मूर्छा से नहीं, अमूर्च्छा से है. आत्म विस्मरण से नहीं, परिपूर्ण आत्म-सम्रण और जागरण से है.