पिरवार ही संस्कार और संबंधाें की पाठशाला : साध्वी जय श्री जी

    12-Sep-2026
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  मनुष्य के जीवन में परिवार का स्थान सबसे महत्त्वपूर्ण है. ईंट, चूने और पत्थरों से केवल घर की इमारत बनती है; लेकिन प्रेम के जल, सहयोग के सीमेंट और आत्मीयता के आरसीसी से असली घर बनता है. जिस घर में माता-पिता, भाई-बहन और बच्चे एक-दूसरे के साथ प्रेम, सम्मान और अपनत्व से रहते हैं, उसे ही सही अर्थों में परिवार कहा जा सकता है. माता-पिता की छत्रछाया साथ हो तो हर दिन धनतेरस है, उनके आशीर्वाद से जीवन में शिवरात्रि है. भाई-बहन और बच्चे साथ हों तो हर दिन दिवाली का उत्सव है. परिवार का अर्थ केवल साथ रहना नहीं, बल्कि एक-दूसरे के सुख-दुख में मजबूती से साथ देने की भावना है. परिवार ही व्यक्ति का पहला मंदिर और संस्कार की पहली पाठशाला है. आज कई परिवारों को छोटी-छोटी बातों, अपेक्षाओं और अहंकार के कारण तनाव का सामना करना पड़ रहा है. ऐसे में रिश्तों में ‌‘लेट गो‌’ (जाने देने) की भावना रखना बहुत जशरी है. परिवार को मजबूत बनाने के लिए छोटी बातों को बड़ा रूप न दें, गल्तियों को माफ करें, क्रोध पर प्रेम से विजय पाएं और ‌‘मैं‌’ से ज्यादा ‌‘हम‌’ को महत्त्व दें. क्योंकि पैसा, संपत्ति और सफलता जीवन को सुख-सुविधाएं दे सकते हैं; लेकिन एक सुखी परिवार ही जीवन को सच्चा संतोष और मन की शांति देता है. - बिबवेवाड़ी श्री संघ