कोथरूड, 13 सितंबर (आज का आनंद न्यूज नेटवर्क) श्री वर्धमान सांस्कृतिक प्रतिष्ठान में विराजित गुरुदेव श्री अभिषेक मुनिजी ने कहा पर्यूषण महापर्व आराधना, साधना और आत्म-जागृति के दिवस हैं. इन पर्वों का जनमानस पर विशेष प्रभाव पड़ता है. जो व्यक्ति सामान्य दिनों में धर्मस्थान तक नहीं आता, वह भी पर्यूषण के दौरान धर्मध्यान, तप, त्याग और धार्मिक अनुष्ठानों से जुड़ने का प्रयास करता है. यह पर्व के समय का ही प्रभाव है. पर्व यानी आत्मा की मिठास. ‘पर्व’ शब्द ‘पौरी’ से बना है. पौरी का अर्थ होता है किसी वस्तु का एक हिस्सा या टुकड़ा, जैसे गन्ने की पौरी. गन्ने के कण-कण में मिठास होती है और उसी से गुड़, शक्कर सहित अनेक मीठे पदार्थ बनते हैं. इसी प्रकार पर्यूषण महापर्व आत्मा की मिठास को प्रकट करने और जीवन में आत्म-जागृति लाने का पर्व है. यह हमें भीतर की ओर लौटने और अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानने की प्रेरणा देता है.
समय बदलता है, जीवन की दिशा भी बदलती है उन्होंने कहा समय की अपनी महिमा और प्रभाव होता है. समय प्रतिपल बदलता रहता है, जिसका अनुभव प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन में करता है. एक समय था जब जीवन में सुविधाएं कम थीं, साधन सीमित थे, फिर भी मनुष्य के पास समय था. आज तकनीक और सुविधाओं ने जीवन को आसान तो बनाया है, लेकिन समय का अभाव बढ़ता जा रहा है. छोटा हो या बड़ा, आज लगभग हर व्यक्ति स्वयं को व्यस्त महसूस करता है. तप का वास्तविक अर्थ है आत्मा से जुड़ना और शरीर तथा संसार की आसक्ति से दूर होना. लेकिन आज तकनीक हमें उन लोगों और विषयों से भी जोड़ रही है, जिनका हमारे जीवन में कोई वास्तविक संबंध या उपयोगिता नहीं है. हम ऐसे व्यक्तियों से भी भावनात्मक रूप से जुड़ते जा रहे हैं, जिन्हें हम जानते तक नहीं. उन्होंने कहा परमात्मा ने स्पष्ट किया है कि संसार से हमारा संबंध जितना कम होगा, कर्मबंधन भी उतना ही कम होगा. इसके विपरीत मोबाइल और अन्य तकनीकी साधनों के माध्यम से हम निरंतर संसार से जुड़ते जा रहे हैं और अनजाने में अपने कर्मबंधनों को बढ़ाते जा रहे हैं.