मन की शांति की चाबी दूसरों के हाथ में मत दो : श्री अभिषेक मुनिजी

    15-Sep-2026
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कोथरुड, 14 सितंबर (आ. प्र.)

 श्री वर्धमान सांस्कृतिक प्रतिष्ठान में विराजित गुरुदेव श्री अभिषेक मुनिजी ने कहा कि, अंतगढ़ सूत्र में अनेक महापुरुषों की साधना और उनके जीवन में आई विपरीत परिस्थितियों का वर्णन मिलता है. परमात्मा के शासन में दीक्षित होने के बाद इन महापुरुषों ने समभाव, सहनशीलता और सहिष्णुता की साधना करते हुए कठिन से कठिन परिस्थितियों को शांत भाव से स्वीकार किया. समभाव का अर्थ है सुख-दुख, लाभ-हानि, मान-अपमान, निंदा-प्रशंसा तथा अनुकूलप्रि तकूल परिस्थितियों में मन को संतुलित रखना. परिस्थितियां हमारे नियंत्रण में नहीं होतीं, लेकिन उनके प्रति हमारी प्रतिक्रिया हमारे हाथ में होती है. प्रशंसा मिले तो अहंकार न आए और अपमान मिले तो क्रोध न जगे-यही आत्मिक साधना है. जैन दर्शन में राग और द्वेष को कर्मबंधन का प्रमुख कारण माना गया है. व्यक्ति, वस्तु और परिस्थितियों के प्रति जितना मोह बढ़ता है, मन उतना ही अशांत होता है. समभाव हमें सिखाता है कि संसार में रहते हुए भी संसार को अपने भीतर न बसने दें| हमारा मन किसी दूसरे के व्यवहार से संचालित न हो; अपनी मनःशांति की चाबी दूसरों के हाथ में न देना ही समभाव की पहचान है.