कोथरुड, 16 सितंबर (आ. प्र.) श्री वर्धमान सांस्कृतिक प्रतिष्ठान में विराजित गुरुदेव श्री अभिषेक मुनिजी ने कहा कि, क्षमा केवल किसी दूसरे को माफ कर देने का नाम नहीं है, बल्कि अपने भीतर संचित राग, द्वेष, क्रोध और वैर की गांठों को खोलने की साधना है. पर्यूषण महापर्व की आराधना का चरम संदेश ही यही है कि, हम अपने अंतर्मन को देखें, अपनी भूलों को स्वीकार करें और जिन-जिन जीवों के प्रति हमारे मन में कटुता उत्पन्न हुई है, उनके प्रति मैत्री एवं क्षमा का भाव धारण करें. भगवान महावीर ने आत्मशुद्धि का मार्ग बताते हुए कहा है कि, मनुष्य को सबसे पहले अपने भीतर झांकना चाहिए. हम दूसरों की गल्तियां बहुत आसानी से देख लेते हैं, लेकिन अपनी भूलों को स्वीकार करना कठिन लगता है. क्षमा वहीं जन्म लेती है, जहां अहंकार झुकता है. क्रोध के समय मनुष्य सोचता है कि सामने वाले ने मेरा नुकसान किया है, लेकिन वास्तव में क्रोध सबसे पहले स्वयं को जलाता है. जिस व्यक्ति के प्रति हम द्वेष रखते हैं, संभव है उसे इसका पता भी न हो, लेकिन हम अपने ही मन में उस घटना को बार-बार जीते रहते हैं, इसलिए क्षमा दूसरे पर उपकार नहीं, स्वयं पर किया गया सबसे बड़ा उपकार है. - श्री अभिषेक मुनिजी