राग-द्वेष के बंधन को पहचानकर तोड़ना ही आत्ममुक्ति

    18-Sep-2026
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 कोथरुड, 17 सितंबर (आ. प्र.)

श्री वर्धमान सांस्कृतिक प्रतिष्ठान में विराजित गुरुदेव श्री अभिषेक मुनिजी ने कहा कि, संसार में आत्मा को बांधने वाले प्रमुख बंधनों में राग और द्वेष सबसे महत्वपूर्ण हैं. देखने में राग और द्वेष एक-दूसरे के बिल्कुल विपरीत दिखाई देते हैं, लेकिन वास्तव में दोनों एक-दूसरे के पक्के साथी हैं. जहां राग होता है, वहां द्वेष की संभावना रहती है और जहां द्वेष होता है, वहां राग भी किसी न किसी रूप में जुड़ा हुआ होता है. राग का अर्थ है- प्यार, प्रेम और मोह, जबकि द्वेष का अर्थ है- घृणा और नफरत. व्यक्ति जिसे पसंद करता है, उसके प्रति राग रखता है और जिसे नापसंद करता है, उसके प्रति द्वेष पैदा करता है. यही पसंद और नापसंद की वृत्ति आत्मा को संसार से बांधे रखती है, इसलिए दोनों अलग दिखाई देने के बावजूद आत्मबंधन की प्रक्रिया में एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं. कोई भी धागा एक अकेले रेशे से नहीं बन सकता. जब दो या उससे अधिक तंतु आपस में जुड़ते और बंधते हैं, तभी धागे का निर्माण होता है और अनेक धागे मिलकर मजबूत रस्सी का रूप ले सकते हैं. इसी प्रकार राग और द्वेष के तंतु मिलकर आत्मा के लिए मजबूत बंधन का निर्माण करते हैं. - श्री अभिषेक मुनिजी