विद्यालय सारी दुनिया में बनाये जा रहे हैं, विश्वविद्यालय बनाये जा रहे हैं. सारी दुनिया का ध्यान बच्चाें की शिक्षा पर दिया जा रहा है और ज्यादा से ज्यादा लाेग शिक्षित भी हाेते जा रहे हैं, लेकिन परिणाम बहुत शुभ नहीं है.
अभी हमारे मुल्क में शिक्षा कुछ कम है, कुछ दिनाें में बढ़ जायेगी, लेकिन शिक्षा के साथ-साथ जगत में न शांति आ रही है, न आनन्द आ रहा है. हम मानते हैं कि शिक्षा देकर बहुत कुछ हाे जायेगा लेकिन ऐसा हाेता नहीं. जरूर शिक्षा के आधाराें मे भूलें हाेंगी, निश्चित ही कुछ आधारभूत गड़बड़ हाेगी. शिक्षा का उपक्रम असफल ही है. एक विवेकपूर्ण संस्कृति पैदा करने में वह बिल्कुल विफल है. हम देखते हैं कि जाे मनुष्य शिक्षित हैं, वे मनुष्यता की दृष्टि से उन मनुष्याें से भी नीचे हाे गये हैं, जाे कि अशिक्षित हैं. पहाड़ाें में जाे आदिवासी हैं, वे हमसे ज्यादा प्रेमपूर्ण है. हम जाे बहुत ज्यादा कठाेर, असभ्य, वा पाषाण-हृदय हाेते जा रहे हैं, वह सब शिक्षा से ही हाे रहा है. वहीं शिक्षा तुम्हें भी मिल रहीं है, वही शिक्षा सारी दुनिया में सारे बच्चाें काे मिल रही है. इससे डर मालूम हाे रहा है.
तुम्हारा भविष्य कुछ बहुत प्रकाशपूर्ण नहीं है. अगर इस शिक्षा पर तुम निर्भर रहे ताे तुम्हारे संबंध में बहुत आशा नहीं बांधी जा सकती. क्योंकि आज तक इस शिक्षा से जाे कुछ पैदा हुआ है वह किसी भी भांति सुखद नहीं है.
जैसा कि अभी यहां कहा गया कि विद्यालय में धार्मिक शिक्षा जाेड़ी जाये, लेकिन वह भी हाे ताे भी कुछ हाेने वाला नहीं है. क्योंकि दुनिया में धार्मिक शिक्षा बहुत दिनाें से दी जा रही है, उसके परिणाम अच्छे नहीं हुए हैं. धर्म की शिक्षा के नाम पर ्नया सिखाया जाता है? अगर जैन धर्म से संबंधित विद्यालय है ताे जैन धर्म की शिक्षा सिखाई जाती है और किसी दूसरे धर्म का, ताे दूसरे धर्म के शास्त्र पढ़ाये जाते हैं. लेकिन शास्त्र जानने से ्नया हाेता है? सिखाने के नाम पर बच्चाें से शब्द और शास्त्र कंठस्थ करा लिये जाते हैं.
काेरी बातें तुम्हारे दिमाग में डाल दी जाती हैं. तुम्हें बता दिया जात है कि आत्मा है, स्वर्ग है, माेक्ष है. तुम्हें बता दिया जाता है कि कैवल्य-ज्ञान का ्नया अर्थ है, सम्यक् दर्शन ्नया है, सम्यक् चरित्र ्नया है. यह सब तुम सीख लेते हाे, उसकी परीक्षा दे देते हाे और परीक्षा में उत्तीर्ण भी हाे जाते हाे. लेकिन इससे काेई बेहतर आदमी पैदा नहीं हाेता. मैं ऐसी धर्मिक शिक्षा के विराेध में हूं. क्योंकि उससे परिणाम भले की जगह बुरे ही निकलते हैं.
ऐसी शिक्षा के परिणामस्वरूप छाेटेछाेटे बच्चे यदि जैन स्कूल में पढ़ें ताे जैन हाे जाते हैं, मुसलमान स्कूल में पढ़ें ताे मुसलमान हाे जाते हैं, ईसाई स्कूल में पढें ताे ईसाई हाे जाते हैं, और फिर ये जैन, मुसलमान, ईसाई आपस में झगड़कर परेशानी पैदा करते हैं, इन सांप्रदायिक बुद्धि के लाेगाेें से मनुष्यता का निरंतर घात हाेता है.
इस भांति की शिक्षा से तुम्हारे भीतर धर्म का नहीं, धार्मिक संकीर्णता और जड़ता का जन्म हाेता है. तुम संप्रदायाें से बंध जाते हाे; सारी मनुष्यता के साथ एकात्मकता के साथ न बंधकर एक अलग छाेटे से टुकड़े के साथ बंध जाते हाे और इन टुकड़ाें के कारण दुनिया में बहुत संघर्ष, बहुत वैमनस्य और बहुत ईर्ष्या चली है. इसके इतने दुःखद परिणाम हुए हैं, इतनी हिंसा बढी है, जिसका काेई हिसाब नहीं. ताे फिर ्नया करें? मैं यह निवेदन करना चाहता हूं कि धार्मिक शिक्षा की जरूरत नहीं है, धार्मिक साधना का जरूरत है. और यह बड़े आश्चर्य की बात है कि धार्मिक शिक्षा या ताे जैनियाें की हाेगी या मुसलमानाें की हाेगी या हिन्दुओं की हाेगी-लेकिन धार्मिक साधना न ताे जैन की हाेती है, न मुसलमान की हाेती है, न हिन्दू की हाेती है. धार्मिक साधना ताे बात ही अलग है- उसकाे संप्रदाय से काेई संबंध नहीं है. धार्मिक साधना का ्नया अर्थ है?