गलाेय की बेल पूरे भारत में पाई जाती है. इसकी आयु कई वर्षाें की हाेती है. मधुपर्णी, अमृता, तंत्रिका, कुण्डलिनी गुडूची आदि इसी के नाम हैं. गिलाेय की बेल प्रायः कुण्डलाकार चढ़ती है. नीम और आम के वृक्ष के पास में यह उग जाती है. नीम के पेड़ पर चढ़ी गिलाेय काे औषधीय दृष्टि से सर्वश्रेष्ठ माना जाता है.
इसका काण्ड छाेटी अंगुली से लेकर अंगूठे जितना माेटा हाे सकता है. इसके पत्ते पान के आकार के हाेते हैं इसमें ग्रीष्म ऋतु में छाेटेछाेटे पीले रंग के गुच्छाें में ूल आते हैं. इसके फल मटर के दाने के आकार के हाेते हैं जाे पकने पर लाल हाे जाते हैं.
औषधि के रूप में इसके काण्ड तथा पत्ताें का प्रयाेग किया जाता है.
पुराने बुखार या 6 दिन से भी ज्यादा समय से चले आ रहे बुखार के लिए गिलाेय उत्तम औषधि है. इस प्रकार के बुखार के लिए लगभग 40 ग्राम गिलाेय काे कुचलकर मिट्टी के बर्तन में पानी मिलाकर रात भर ढक कर रख देते हैं. सुबह इसे मसल कर छानकर राेगी काे दिया जाना चाहिए. इसकी अस्सी ग्राम मात्रा दिन में तीन बार पीने से जीर्ण ज्वर नष्ट हाे जाता है.
ऐसा बुखार जिसके कारणाें का पता नहीं चल पा रहा हाे उसका उपचार भी गिलाेय द्वारा संभव है. पुररीवर्त्तक ज्वर में गिलाेय की चूर्ण तथा उल्टी के साथ ज्वर हाेने पर गिलाेय का धनसत्व शहद के साथ राेगी काे दिया जाना चाहिए. बारबार हाेने वाला मलेरिया, कालाजार जैसे राेगाें में भी यह बहुत उपयाेगी है. मलेरिया में कुनैन के दुष्प्रभावाें काे यह राेकती है.
टायायड जैसे ज्वर में भी यह बुखार ताे खत्म करती है राेगी की शारीरिक दुर्बलता भी दूर करती है. टीबी के कारक माइक्राेबैक्टीरियम ट्यूबरक्यूलम बैसीलस जीवाणु की वृद्धि काे यह राेक देती है. यह रक्त मार्ग में पहुंच कर उस जीवाणु का नाश करती है और उसकी सिस्ट बनाने की प्रक्रिया काे बाधित करती है.
ऐस्केनिशिया काेलाइ नामक राेगाणु जिसका आक्रमण मुख्यतः मूत्रवाही संस्थान तथा आंताें पर हाेता है, काे यह समूल नष्ट कर देती है. ग्लूकाेज टाेलरेंस तथा एड्रीनेलिनजन्य हाइपर ग्लाइसीमिया के उपचार में भी गिलाेय आश्चर्यजनक परिणाम देती है. इसके प्रयाेग से रक्त में शर्करा का स्तर नीचे आता है. मधुमेह के दाैरान हाेने वाले विभिन्न संक्रमणाें के उपचार में भी गिलाेय का प्रयाेग किया जाता है.
बुखार या लंबी बीमारी के बाद आई कमजाेरी काे दूर करने के लिए गिलाेय के क्वाथ का प्रयाेग किया जाना चाहिए. इसके लिए 100 ग्राम गिलाेय काे शहद के साथ पानी में पकाना चाहिए. सुबहशाम इसकी 12 औंस मात्रा का सेवन करना चाहिए. इससे शरीर में शक्ति का संचार हाेता है.
एलर्जी, कुष्ठ तथा सभी प्रकार त्वचा विकाराें में भी गिलाेय का प्रयाेग लाभ पहुंचाता है. आंत्रशाेथ तथा कृमि राेगाें में भी गिलाेय लाभकारी है. यह तीनाें प्रकार के दाेषाें का नाश भी करती है. घी के साथ यह वातदाेष, मिसरी के साथ पित्तदाेष तथा शहद के साथ कफ दाेष का निवारण करती है. हृदय की दुर्बलता, लाे ब्लड प्रेशर तथा विभिन्न रक्त विकाराें में यह ायदा पहुंचती है.