कोथरुड, 18 सितंबर (आ. प्र.) श्री वर्धमान सांस्कृतिक प्रतिष्ठान में विराजित गुरुदेव श्री अभिषेक मुनिजी ने कहा कि, संसार में व्यक्ति मुख्यतः राग और द्वेष के बंधनों से बंधा हुआ है. यदि मनुष्य को इन बंधनों की सही जानकारी और उनका वास्तविक ज्ञान हो जाए, तो वह स्वयं को इनसे बचाने का प्रयास कर सकता है. समस्या यह है कि मनुष्य बंधन में रहते हुए भी स्वयं को बंधा हुआ अनुभव नहीं करता. उसे अपने मोह, ममता, आसक्ति और द्वेष सामान्य जीवन का हिस्सा दिखाई देते हैं. बाहरी जानकारी प्राप्त कर लेना अलग बात है. संसार की अनेक प्रकार की जानकारियां हमें कहीं से भी प्राप्त हो सकती हैं, लेकिन जिस ज्ञान का संबंध आत्महित और आत्मकल्याण से न हो, वह ज्ञान अपने वास्तविक अर्थ में ज्ञान नहीं कहलाता. ज्ञान वही सार्थक है, जो व्यक्ति के आचरण और जीवन-दृष्टि में परिवर्तन लाए. ज्ञान के साथ विनम्रता का होना भी आवश्यक है. जिस ज्ञान के साथ विनय नहीं है, वह ज्ञान व्यक्ति में अहंकार को बढ़ा सकता है और वही अहंकार आगे चलकर नए बंधनों का कारण बन जाता है, इसलिए जैन दर्शन में सम्यक् ज्ञान को विशेष महत्व दिया गया है. सम्यक् ज्ञान व्यक्ति को केवल जानने वाला नहीं बनाता, बल्कि अपने भीतर झांकने और अपनी कमजोरियों को पहचानने की दृष्टि प्रदान करता है. जो व्यक्ति इन अदृश्य बंधनों को पहचानता है, उनसे मुक्त होने का पुरुषार्थ करता है और आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ता है, वही वास्तविक साधक है. जीवन की सार्थकता बंधनों को बढ़ाने में नहीं, बल्कि उन्हें पहचानकर धीरे-धीरे उनसे मुक्त होने में है.