क्रोध पर नियंत्रण ही क्षमा की साधना

    02-Sep-2026
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कोथरुड, 1 सितंबर (आ.प्र.)

 श्री वर्धमान सांस्कृतिक प्रतिष्ठान में विराजित गुरुदेव श्री अभिषेक मुनिजी ने कहा कि, चार कषाय- क्रोध, मान, माया और लोभ का आध्यात्मिक महत्व हैं. कषाय वह है, जो आत्मा को संसार में कसकर बांधकर रखता है. प्रत्येक व्यक्ति कषायों को जानता और समझता है, लेकिन इनके परिणामों को जानते हुए भी इनके जाल में उलझा रहता है. ये चारों कषाय आत्मिक पतन के प्रमुख कारण हैं. क्रोध प्रीति का नाश करता है, मान विनय भाव को समाप्त करता है, माया अर्थात छल-कपट मित्रता को नष्ट करती है और लोभ सभी सद्गुणों का घातक है. इन चारों में क्रोध ऐसी कषाय है, जिसमें मनुष्य बार-बार उलझता रहता है और आत्मचिंतन के अगले चरण तक पहुंच ही नहीं पाता. छोटी-सी बात भी व्यक्ति को उत्तेजित कर देती है. ऐसा लगता है जैसे सामने वाला कुछ कहे और हम तुरंत उस पर प्रतिक्रिया देने के लिए तैयार बैठे हों. क्रोध का परिणाम सभी जानते हैं, फिर भी उसे छोड़ना कठिन लगता है, लेकिन यदि व्यक्ति स्वयं से प्रश्न करे कि मैं क्रोध में कितनी देर रह सकता हूं? तो कुछ समय बाद क्रोध शांत होना ही पड़ता है. उसके बाद मनुष्य स्वयं पछताता है- मैंने क्रोध क्यों किया? इतनी छोटी बात थी, इसे शांतिपूर्वक भी सुलझाया जा सकता था. क्रोध शांत होने के बाद हमें अपनी गलती का एहसास होता है और कई बार सामने वाले से क्षमा भी मांगनी पड़ती है, इसलिए चिंतन करना चाहिए कि जिस क्रोध के बाद पश्चाताप और क्षमायाचना करनी पड़े, उसे उत्पन्न ही क्यों होने दिया जाए? क्रोध आत्मा का स्वभाव नहीं, विभाव है; और विभाव आत्मा को केवल नुकसान पहुंचाता है. क्रोध हमारे आत्मगुणों का घातक है, इसलिए क्रोध को दबाने मात्र के बजाय उसे पहचानना, उसके कारणों को समझना और क्रमशः उसे कम करने का पुरुषार्थ करना चाहिए.