धर्म का परम्परा से काेई संबंध नहीं है. परम्परा यानी वह जाे मर चुका. परम्परा यानी पिटी-पिटाई लकीर. परम्परा यानी अतीत के चरण-चिन्ह. अतीत जा चुका, चरण चिन्ह रह गये हैं राहाें पर बने.
धर्म परम्परा नहीं है. धर्म ताे नितनूतन है-यद्यपि चिर पुरातन भी. मगर धर्म पुराना नहीं है, परम्परा नहीं है. इसलिए ताे धर्म का शिक्षण नहीं हाे सकता; परम्परा हाेती ताे शिक्षण हाे सकता था. गणित की परम्परा है. विज्ञान की परम्परा है. इसलिए विज्ञान का शिक्षण हाे सकता है.
आइंस्टीन ने एक खाेज कर ली, सापेक्षता के सिद्धांत की, ताे अब काेई हर आदमी काे खाेजने की जरूरत नहीं है; अब परम्परा बन गई. अब ताे सिद्धांत एक दफा खाेज लिया गया. अब ऐसा थाेड़ी है कि हर विद्यार्थी जाे पढ़ने जायेगा विश्व-विद्यालय में उसकाे आइंस्टीन के सिद्धांन्त काे फिर-फिर खाेजना हाेगा. बात खत्म हाे गई. खाेज पूरी हाे गई. एक आदमी ने खाेज दिया, फिर परम्परा बन गई. अब दूसरा ताे सिर्फ पढ़ लेगा.आइंस्टीन काे जाे खाेजने में वर्षाें लगे हाेंगे, वह अब किसी विद्यार्थी की पढ़ने में घंटे भी न लगेंगे.
ताे विज्ञान की परम्परा बनती है, ट्रेडीशन हाेती है. धर्मं की काेई परम्परा नहीं हाेती. महावीर काे ज्ञान उपलब्ध हुआ, इससे तुम साेचते ही, तुम्हें खाेजना न पड़ेगा? बुद्ध काे ज्ञान उपलब्ध हुआ, इससे ्नया तुम साेचते हाे, बात खत्म हाे गई, अब तुम पढ़ लाेगे धम्मपद? जैसे आइंस्टीन की किताब काे पढ़ के काेई सापेक्षता का सिद्धांत समझ लेगा, ्नया वैसे ही तुम कृष्ण की गीता पढ़ कृष्ण के सिद्धांत काे समझ लाेगे, या महावीर के वचन पढ़कर महावीर काे समझ लाेगे? नहीं, तुम्हें फिर-फिर खाेजना हाेगा.
इसे जरा समझना. फिर-फिर खाेजना हाेगा. जाे चीज परम्परा बन जाती है उसकाे दुबारा नहीं खाेजना हाेता; खाेज ली गई, बात खत्म हाे गई.
धर्म परम्परा बनता ही नहीं. उसका प्रत्येक व्य्नित काे पुनः पुनः अविष्कार करना हाेता है. जाे बृद्ध ने खाेजा वह बुद्ध का अनुभव है. इतनी ही हमें मिल सकती है उनसे खबर कि खाेजने वाले खाेज लेते हैं. बस इतना आश्वासन.
सत्य नहीं मिलता, सत्य का आश्वासन मिलता है.
सत्य नहीं मिलता; सत्य भी संभव है, इसकी संभावना पर भराेसा मिलता है.
महावीर ने खाेजा, कृष्ण ने खाेजा, क्राइस्ट ने खाेजा, इससे हमें केवल इतनी खबर मिलती है कि हम यूं ही व्यर्थ खाेज में नहीं लगे हैं, मिल सकता है. बस, इतनी श्रद्धा मिलती है. सत्य नहीं मिलता, इतना आत्म-भराेसा मिलता है कि हम यूं ही अंधेरे में व्यर्थ नहीं टटाेल रहे हैं, द्वार है; क्योंकि कुछ लाेग निकल गये. कुछ जाे भीतर थे बाहर हाे गये हैं ताे हम भी हाे सकेंगे. लेकिन इससे यह मत साेचना कि उनकी किताब पढ़ ली और चल पड़े द्वार खाेज के और निकल पड़े बाहर. द्वार तुम्हें अपना पुनः खाेजना पड़ेगा.
इसलिए धर्म की काेई परम्परा नहीं बनती. और धर्म का काेई शिक्षण नहीं हाे सकता. धर्म क्रांति है, परम्परा नहीं.
रेवाेल्यूशन! और जिस पर घटती है, बस उस पे ही घटती है.