दुनिया में सबसे बड़ी गुलामी 'दिमागी गुलामी' है

    21-Sep-2026
Total Views |

Osho 
हम सब किसी न किसी कारागृह के शिकार हैं और किसी न किसी कारागृह के कैदी हैं और दुनिया में बहुत से कारागृह हैं, और उनमें अनेक अपने-अपने हिसाब से कहीं न कहीं बंध जाता है. काेई जन्म से, काेई परंपरा से, काेई शिक्षण से और हम एक-एक जेल में बंद हाे जाते हैं.
 
इस जगत में इससे बड़ी गुलामी काेई नहीं है जिसकाे हम दिमागी गुलामी कह सकते हैं. और हम सब किसी न किसी कारागृह के शिकार हैं और किसी न किसी कारागृह के कैदी हैं और दुनिया में बहुत से कारागृह हैं, और उनमें अनेक अपने-अपने हिसाब से कहीं न कहीं बंध जाता है.
 
काेई जन्म से, काेई परंपरा से, काेई शिक्षण से और हम एक-एक जेल में बंद हाे जाते हैं. यह जमीन बहुत-सी जेलाें में बंटी है, दिमागी जेलाें में, जिसमें हम सब बंद हैं और जिनके बीच काेई संबंध नहीं रह गया है. यह घातक है परतंत्रता. परतंत्रता का मतलब है, पर के विचाराें काे ऐसा अंगीकार कर लेना जैसे वे स्व के हैं. एक स्वतंत्रता बनी रहे आपके चित्त में और स्मरण रहे कि मेरा वह ज्ञान केवल, मेरा आकाश बनेगा और किसी भी विचार-श्रेष्ठतम विचार भी मेरा पैटर्न बन जाए, मेरा विचार का ढांचा न बन जाए. अभी हमारी जाे शिक्षा है, हमारी दीक्षा है, वह मनुष्य काे स्वतंत्रता नहीं सिखाती, वह कन्फर्मेशन सिखाती है.
 
वह सिखाती है, कन्फर्म कराे परंपरा काे, मां-बाप काे, इनकाे, उनकाे. ये जाे कहते हैं, इनके साथ बिलकुल इनका अनुगमन कराे. वह अनुगमन सिखाती है, स्वतंत्रता नहीं सिखाती. और यही कारण है कि मनुष्य के भीतर बचपन से हम दिमाग काे एक ढांचे में ढालना शुरू कर देते हैं, कहीं वह स्वतंत्र न हाे जाए. कहीं वह उस घेरे से मुक्त न हाे जाए. जिस घेरे से हम कैदी रहे हैं. कहीं वह उन दीवाराें में, जिनमें हम थे मुक्त न हाे जाए. सारा समाज यही काेशिश करता है कि काेई स्वतंत्र न हाे जाए. यानी पूरी शिक्षा और दीक्षा ऐसी है कि आदमी परतंत्र हाे, और जाे जितना ज्यादा परतंत्र हाेगा विचार के तल पर वह उतना ही समाज के लिए कम खतरनाक हाेगा. समाज के लिए बिलकुल खतरनाक नहीं हाेगा. मशीनें खतरनाक नहीं हाेतीं. मशीनाें में एक बड़ी सुविधा है, न वह विचार करती हैं, न वह स्वतंत्र हाेती हैं. जैसा कहिए वैसा करती हैं. और आदमी जितना मशीन की तरह हाे जाए, समाज उसकाे बड़ा आदर देगा. समाज की इच्छा है, हर आदमी मशीन हाे जाए. सारे राष्ट्राें की, सारी स्टेट की, सारी हुकूमताें की इच्छा है, आदमी मशीन की तरह हाे जाए-हम जैसा कहें वैसा कर दे. पखें से कहें चलाे, चलता है, बंद कर देते हैं, ताे बंद हाे जाता है बटन दबाने पर पंखा यह नहीं कहता है कि अब हमारे चलने के इरादे हैं, अब हम चलेंगे. मशीन बड़ी सुविधाजनक है.
 
समाज, समस्त समाजाें की, समस्त संगठनाें की, समस्त आर्गनाइजेशन की, समस्त हुकूमताें की इच्छा है कि आदमी बिलकुल मशीन हाे उसे स्वतंत्रता न हाे, वह साेच न सके. साेचने घातक है, खतरनाक है. हाे सकता है साेचकर वह कुछ ऐसी बात कहे जाे कि पैटर्न में बंधी व्यवस्था में उपद्रव खड़ा कर दे.