नई दिल्ली, 21 सितंबर (विशेष प्रतिनिधि)
देश में मेडिकल सुविधा बढ़ाने के लिए 30 लाख कराेड़ रुपये निवेश की जरूरत है. देशभर में फाइव स्टार जैसे हाॅस्पिटल ताे बढ़ रहे हैं, लेकिन कराेड़ाें लाेगाें काे सही इलाज नहीं मिलता है.
यह चाैंकाने वाला दावा एक विशेष अध्ययन रिपाेर्ट में किया गया है. 2022 से 2024 के बीच स्वास्थ्य एवं दवा कंपनियाें में 3 लाख कराेड़ के लेन-देन हुए.
सरकारी अस्पतालाें की तुलना में प्राइवेट हाॅस्पिटलाें में इलाज का खर्चा 10 गुना से भी ज्यादा है. देश के हर राज्य में ्नलीनिक, नर्सिंग हाेम बेराेकटाेक बढ़ रहे हैं. मरीजाें के साथ लूटमार भी जारी है.
इसके अलावा नियमाें की भी धज्जियां उड़ाई जा रही हैं. एक रिपाेर्ट में पता चला कि कई अस्पताल और जांच केंद्र पिछले पांच साल में ही खुले हैं.
हालांकि, महाराष्ट्र का यह शहर लंबे समय से आसपास के इलाक़ाें के लिए इलाज का बड़ा केंद्र रहा है. इतनी बड़ी संख्या में खुल रहे ये नए अस्पताल और जांच केंद्र बताते हैं कि हाल के वर्षाें में भारत का निजी स्वास्थ्य क्षेत्र कितनी तेज़ी से बढ़ा है.
अस्पताल हर तीन महीने में हज़ाराें नए बेड जाेड़कर तेज़ी से अपना विस्तार कर रहे हैं. जांच केंद्र चलाने वाली कंपनियां छाेटे शहराें तक पहुंच रही हैं. मेडिकल संस्थान देश भर में अपना विस्तार करने के लिए शेयर बाज़ार से कराेड़ाें रुपये जुटा रहे हैं. यह क्षेत्र दुनिया भर की प्राइवेट इक्विटी यानी निजी निवेश करने वाली बड़ी कंपनियाें की पसंद भी बना हुआ है.
साल 2022 से 2024 के बीच भारत की स्वास्थ्य और दवा कंपनियाें में क़रीब 600 विलय, अधिग्रहण और प्राइवेट इक्विटी साैदे हुए. इनकी कुल क़ीमत 2.88 लाख कराेड़ रुपये थी.
ग्रांट थाॅर्नटन के आंकड़ाें के मुताबिक़, इस रकम का 40 प्रतिशत हिस्सा अस्पतालाें में गया. कंसल्टेंसी कंपनी से बीबीसी काे मिले हाल के आंकड़े बताते हैं कि पिछले दाे साल में इस क्षेत्र ने 1.92 लाख कराेड़ रुपये की अतिरिक्त रकम भी जुटाई है. निवेश की इस लहर से देश में स्वास्थ्य सुविधाएं बढ़ी हैं और लाेगाें के लिए इलाज तक पहुंच आसान हुई है. लेकिन इसी तेज़ विस्तार के कारण इलाज इतना महंगा भी हुआ है कि कराेड़ाें भारतीय इसे नहीं करा सकते.