कोथरूड, 21 सितंबर (आ.प्र.) श्री वर्धमान सांस्कृतिक प्रतिष्ठान में विराजित गुरुदेव श्री अभिषेक मुनिजी ने तप की महिमा को जैन दर्शन के संदर्भ में समझाते हुए कहा कि, तप केवल शरीर को कष्ट देने का माध्यम नहीं, बल्कि आत्मा पर जमे कर्मों की निर्जरा और अंतर्मुखी चेतना के जागरण का प्रभावी साधन है. जब तप सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान और सम्यक् चरित्र के साथ जुड़ता है, तब वह आत्मकल्याण की दिशा में सार्थक साधना बन जाता है. जैन आगमों में तप को निर्जरा का प्रमुख कारण बताया गया है. बाह्य तप के माध्यम से साधक अपनी इंद्रियों और इच्छाओं पर संयम स्थापित करता है, जबकि अभ्यंतर तप आत्मनिरीक्षण, प्रायश्चित्त, विनय, वैयावृत्य, स्वाध्याय, व्युत्सर्ग और ध्यान के माध्यम से भीतर की अशुद्धियों को कम करता है. वास्तविक तप वही है, जिसमें भोजन का त्याग होने के साथ-साथ राग-द्वेष, क्रोध, मान, माया और लोभ का भी क्षय होने लगे. तप का परिणाम केवल तपस्या की अवधि से नहीं, बल्कि उसके पीछे की भावना और आत्मिक जागरूकता से निर्धारित होता है. तप से सहनशीलता बढ़ती है, इच्छाओं पर नियंत्रण आता है, आसक्ति कमजोर होती है और आत्मा अपने वास्तविक स्वरूप की ओर अग्रसर होती है. तप का सर्वोच्च उद्देश्य शरीर को दुर्बल करना नहीं, बल्कि मोह, माया, अहंकार को दुर्बल करना है. इस अवसर पर गुरुदेव ने तपस्विनी साध्वी गुरुवर्या श्री विभाश्री जी म.सा. के जन्मदिवस पर मंगल आशीर्वचन देते हुए उनके दीर्घ संयममय जीवन की मंगलकामना की. साथ ही उनके द्वारा गतिमान दीर्घ उपवास तप की साधना की अनुमोदना करते हुए कहा, साध्वी विभाश्रीजी म.सा. की तपस्या केवल व्यक्तिगत साधना नहीं, बल्कि समाज के लिए भी आत्मसंयम, त्याग और आध्यात्मिक जागरण का संदेश है. जन्मदिवस को तप, संयम और आत्मसाधना के साथ मनाना जीवन को उत्सव से उठाकर साधना का पर्व बना देता है.