मनुष्य पूरब में जरूर सुस्त हाे गया, काहिल हाे गया, लेकिन सुस्त और काहिल हाे गया धार्मिक नहीं हुआ. जाे लाेग तुमसे कहते हैं कि पूरब के देश धार्मिक है, सरासर झूठ कहते हैं.
मेरे अनुभव में निरंतर यह बात आती है कि पश्चिम से जाे लाेग आते हैं, उनकी पकड संसार पर कम है, पूरब के लाेगाें की पकड संसार पर ज्यादा है. धन पर ज्यादा है. कुछ करते नहीं, उस पकड़ काे पूरा करने के लिए कुछ करते नहीं, प्रतिक्षा कर रहे हैं लेकिन याेजनाएं मन में वही हैं. पश्चिम के लाेग कुछ करते हैं, यह अच्छा है, कम से कम कुछ करते ताे हैं, जिस बात की पकड है उसकाे पूरा करने के लिए कुछ करते हैं.
पूरब के लाेगाें की पकड वही हैं, मन में वही राेग है, वही रस है, वही मवाद बह रही है मन के भीतर, वही घाव है, लेकिन बैठे हैं, करते कुछ नहीं. और इस बैठे हाेने काे समझाते हैं कि धार्मिक हाे गए हैं. माला हाथ में है, राम-राम जपते हैं और बगल में छुरी है. छुरी पर ध्यान रखना, माला पर बहुत ध्यान मत देना, वह ताे यंत्रवत हाथ में घूम रही है. असली बात अगर भगवान की लाेग प्रार्थना भी कर रहे हैं ताे भी धन ही मांगने के लिए कर रह हैं कि प्रभु, हम पर कृपा कब हाेगी? लुच्चे-लंगे आगे बढे और जा रहे हैं, हम पर कृपा कब हाेगी? हर काेई सफल हुआ जा रहा है, हम पर कृपा कब हाेगी? लेकिन अगर तुम पूछाे कि कृपा के भीतर छिपाए क्या हाे, मांगते क्या हाे, ताे तत्क्षण पाओगे-धन हैं, पद है, प्रतिष्ठा है. पश्चिम में लाेग जाे वासना करते हैं, उसके लिए श्रम करते हैं. पूरब में वासना करते हैं और श्रम नहीं करते, इतना ही फर्क हुआ है लेकिन वासना की दाैड जारी है. इससे काेई फर्क नहीं पडता कि तुम अपनी वासना काे कृत्य में उतारते हाे या नहीं, वासना आ गयी कि ऊर्जा बहिर्गामी हाे गयी.
निर्वासना हाेने से ऊर्जा अंतर्यामी हाेती है. ताे पूरब समझा नहीं. बुद्धपुरूषाें ने जाे कहा, उसकी नासमझी उसकी गलत व्याख्या लाेगाें काे काहिल, सुस्त, आलसी कर गयी. अगर बुद्धाें की बात हमने समझी हाेती, ताे जीवन में त्वरा हाेती, चमक हाेती, धार हाेती, प्रज्ञा हाेती, बुद्धि हाेती तुम्हारे जीवन में एक तेजाेमयता हाेती. बुद्ध तुम्हें ीका करने काे नहीं आते, बुद्ध तुम्हें प्रज्वलित करने काे आते हैं. तुम्हारे दीए काे बुझाने नहीं आते, तुम्हारे दीए काे जलाने आते हैं.
तुम्हारे जीवन काे धार देने आते हैं. तुम्हारे जीवन में ऐसी धार आ जाए, ऐसे आनंद की चमक आ जाए, जिस आनंद की तुम तलाश कर रहे हाे, लेकिन गलत दिशा में तलाश कर रहे हाे.
जीवन अर्थात बाहर आनंद काे खाेजने की दिशा गलत है. जीवन अर्थात भीतर ठीक दिशा है. एक जीवन बाहर है, एक जीवन भीतर है. बाहर के जीवन काे बुद्ध दुख कहते हैं, भीतर के जीवन काे सुख कहते हैं. इसलिए कहते हैं, अहाे, हमारा महासुख, हम वैरियाें के बीच अवैरी हाेकर विहरते हैं. देखाे हमारा सुख, हम कामियाें के बीच अकामी हाेकर विहरते हैं. देखाे हमारा सुख, हम आकांक्षियाें के बीच निराकांक्षी हाेकर विहरते हैं. लेकिन देखाे सुख-सुसुखं वत! हमारे सुख काे पहचानाे. तुम्हारे दुख काे दिखाने का प्रयाेजन इतना ही है कि तुम्हारी ऊर्जा सुख की दिशा में गतिमान हाे जाए.