पुणे, 22 सितंबर (आ. प्र.) तेरापंथ धर्मसंघ के आचार्य श्री महाश्रमणजी जहां विहार करते है, वहां उनके साथ धर्म की बातें श्रवण करने के लिए श्रावक और श्राविकाएं भी जाते हैं. इन श्रावकों को खाने की व्यवस्था भी करनी होती है. इस वर्ष पुणे और पिंपरी-चिंचवड़ वालों को यह अवसर प्राप्त हुआ है. अखिल भारतीय तेरापंथ समाज की ओर से हमेशा के लिए चौके की व्यवस्था की जाती है. इस में हर शहर, गांव से इच्छुक श्रावकों को जोड़ा गया है, ताकि उनको चरित्रात्मा की सेवा, दर्शन, जिनवाणी सुनने का अवसर प्राप्त हो सके, साथ ही जब वे खुद आहार पानी के लिए जाते हैं (भावना चौके में) तब साधु-साध्वियों को भावना भाते है, (इच्छा प्रकट करते हैंं कि- आप हमारे यहां पधारें और हमारे हाथ से आहार स्वीकार करें) इस व्यवस्था में श्रावक अपनी इच्छानुसार राशि लिखवा सकता है और हर एरिया से 3, 5, 7 नारी को 7 दिन की सेवा का अवसर प्रदान किया जाता है. इस साल पुणे और पिंपरी-चिंचवड़ से संगीता छाजेड़, संगीता संचेती, रेखा सेमलानी, सरोज चोपड़ा, शालिनी सिंघी को यह लाभ 7 दिन के बजाय 15 दिन का मिला है.
तेरापंथ ेशेतांबर में भावना चौका का मतलब
तेरापंथ में साधु-साध्वी मूर्ति पूजा नहीं करते और भिक्षा (गोचरी) से आहार लेते हैं. तेरापंथ में जब भावना चौका बोला जाता है तो उसके दो अर्थ होते हैं. 1. असली अर्थ - 12 भावनाओं का चौका आचार्य भिक्षु स्वामी ने कहा था - तेरा पंथ यानी भगवान का पंथ. भावना चौका का मतलब है जहां रसोई द्रव्य से नहीं, भाव से बनाई जाए. जब आप आचार्य श्री महाश्रमणजी या साध्वीश्रीजी के चातुर्मास में सेवा देते हैं, तो जो रसोई संघ के लिए, यात्रियों के लिए, या संतों की गोचरी के लिए बनती है. उसमें 12 भावना का चिंतन किया जाता है. जैसे कि- अनित्य, अशरण, संसार, एकत्व, अन्यत्व, अशुचि, आस्रव, संवर, निर्जरा, लोक, बोधि-दुर्लभ और धर्म. इसी भाव से बनी रसोई को तेरापंथ में ‘भावना चौका’ कहते हैं. 2. प्रैक्टिकल में आप जो कर रहे हैं, वो क्या है? तेरापंथ के हिसाब से भावना से किया गया सेवा कार्य है. तेरापंथ का मूल सिद्धांत है. एक गुरु, एक विधान. गुरु आज्ञा से संघ की सेवा करना सबसे बड़ा पुण्य है. चातुर्मास स्थल पर, मर्यादा महोत्सव में, या जहां आचार्य प्रवास करते हैं वहां यह सेवा होती है. चातुर्मास के 4 महीने, मर्यादा महोत्सव (विक्रम संवत 1817 से हर साल माघ शुक्ला सप्तमी को), और बड़े आयोजनों में शुद्ध शाकाहारी, जमीकंद रहित भोजन किया जाता है. यह सेवा स्नान कर, मौन रखकर, सामायिक करके की जाती है. इस में अहिंसा का पूरा ध्यान रखा जाता है. पानी छानना, रात में आटा नहीं गूंथना और कोई भी साधु-साध्वी गोचरी के लिए आए तो शुद्ध भाव से आहार देना, तेरापंथ में चौका लगाने वाले को ‘भावना वाला श्रावक’ कहते हैं, जो यह नहीं सोचता कि मैंने खाना बनाया, बल्कि सोचता है कि मुझे संघ की सेवा का मौका मिला.