
जीवन में फूल हैं तो कांटे भी हैं. सफलता है तो निष्फलता भी है. उससे होने वाले दर्द को सहन कर लेता है और आगे बढ़ जाता है. अपने दर्द को जीवित रखता है. अपने- आप को दुःखी करता है. आप जीवन जीते हो या नहीं, उसकी परीक्षा आप निष्फलता का स्वीकार किस प्रकार करते हो, इससे स्पष्ट होता है. निष्फलता रास्ते की रुकावट नहीं है, विकास की प्रक्रिया का भाग है. निष्फलता आपकी या किसी और की गलती का परिणाम है. उस गल्ती को देखने और सुधारने की जगह क्रोध करना या हताश हो जाना नासमझी है. क्रोध करने से या हताश होने से निष्फलता का कारण दूर नहीं होता. गल्ती को ढूंढकर सुधारने से निष्फलता दूर होती है. निष्फलता का अस्वीकार गल्ती को अस्वीकार है और गल्ती का अस्वीकार स्वयं का अस्वीकार है. स्वयं का अस्वीकार अभिमान है. आप अपनी गल्ती को स्वीकार कर लो तो आप बहुत बड़े नुकसान से बच जाओगे. कोई और आपकी गल्ती सुधारेगा तो पीड़ा होगी और कुछ नुकसान भी. यदि किसी भी प्रकार से गल्ती को स्वीकार नहीं करोगे तो आप अपना बहुत बड़ा नुकसान कर लोगे. महाभारत में दुर्योधन ने अपनी गल्ती को स्वीकार नहीं किया था अतः अपने वंश के नाश का निमित्त बना. निष्फलता या हार को स्वीकार कर लेने से निष्फलता से बोध ले सकते हैं और उससे आगे सफलता के मार्ग को प्रशस्त कर सकते हैं. - श्री वैराग्यरतिविजयजी श्रावस्ती जैन संघ, गुलटेकड़ी - पुणे