संपत्ति अधिकारों में महिलाओं के साथ होता है लिंग आधारित भेदभाव

मुस्लिम उत्तराधिकार नियमों के खिलाफ जनहित याचिका में लगाया गंभीर आरोप

    24-Sep-2026
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SC
नई दिल्ली, 23 सितंबर (वि.प्र.)
सुप्रीम काेर्ट ने मुस्लिम पर्सनल लाॅ के तहत उत्तराधिकार और संपत्ति के गैर-काेडिंग नियमाें काे चुनाैती देने वाली जनहित याचिका (पीआईएल) पर केंद्र सरकार से जवाब मांगा है.
 
याचिका में आराेप लगाया गया है कि ये नियम महिलाओं काे पुरुषाें की तुलना में आधा हिस्सा देकर लिंग आधारित भेदभाव काे संस्थागत रूप देते हैं. इम्तियाजहुसैन शहाबुद्दीन मुल्ला द्वारा दायर याचिका पर मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जाॅयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. माेहना की पीठ ने सुनवाई की. इस दाैरान याचिकाकर्ताओं के वकीलाें ने तर्क दिया कि यह असमान व्यवहार संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), 15 (भेदभाव के खिलाफ अधिकार) और 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) का सीधा उल्लंघन करता है.
 
याचिका में कहा गया है कि जब पर्सनल लाॅ के कारण मनमाना व्यवहार हाेता है, ताे उन्हें संवैधानिक समीक्षा से छूट नहीं मिल सकती. यह मामला शायरा बानाे फैसले के समान है. याचिका में मुस्लिम पर्सनल लाॅ (शरीयत) एप्लीकेशन एक्ट, 1937 की धारा 2 का हवाला देते हुए सवाल उठाया गया कि क्या महिलाओं के सिविल व संपत्ति अधिकाराें काे नुकसान पहुंचाने वाले नियमाें काे कानूनी मान्यता मिलती रहनी चाहिए.
 
मुस्लिम महिलाओं काे संपत्ति में समान अधिकार की गारंटी दी जाए याचिका में हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के 2005 के संशाेधन का उल्लेख किया गया, जिसने बेटियाें काे पैतृक संपत्ति में समान अधिकार दिया है. याचिका में कहा गया कि मुस्लिम कानून में ऐसा काेई प्रावधान नहीं है, जिससे मुस्लिम महिलाओं काे पैतृक और पारिवारिक संपत्ति में बेटाें के बराबर अधिकार नहीं मिल पाता. याचिकाकर्ता ने शीर्ष अदालत से मांग की है कि मुस्लिम पर्सनल लाॅ के तहत लिंग के आधार पर संपत्ति में भेदभाव करने वाले किसी भी नियम या प्रथा काे असंवैधानिक घाेषित किया जाए और मुस्लिम महिलाओं काे संपत्ति में समान अधिकार की गारंटी दी जाए.