कोथरुड, 24 सितंबर (आ. प्र.) श्री वर्धमान सांस्कृतिक प्रतिष्ठान में विराजित गुरुदेव श्री अभिषेक मुनिजी ने कहा कि, संसार में जीव के जन्म लेते ही उसकी पहली अभिव्यक्ति प्रायः रोने के रूप में होती है. जब तक नवजात शिशु रोता नहीं है, तब तक परिजनों के मन में चिंता बनी रहती है. सामान्य धारणा है कि बच्चे का रोना उसके स्वस्थ होने की प्रक्रिया का संकेत माना जाता है, लेकिन चिंतन का विषय है कि जिस जीवन-यात्रा की शुरुआत ही रोने से होती है, उसकी आगे की यात्रा कैसी होगी? महात्मा गौतम बुद्ध के जन्म के संदर्भ में ऐसी अद्भुत घटना का उल्लेख मिलता है कि उनके जन्म के समय उन्होंने सामान्य शिशुओं की तरह रुदन नहीं किया. यह प्रसंग जीवन के प्रति एक गहन चिंतन का संदेश देता है. जैन दर्शन में रोने के पीछे छिपी भावदशा महत्वपूर्ण मानी गई है. व्यक्ति जब दुख, चोट, हानि, रोग, प्रियजन के वियोग अथवा किसी अन्य प्रतिकूल परिस्थिति से प्रभावित होता है, तब उसकी आंखों से आंसू निकलते हैं. यदि इन परिस्थितियों में मन में राग-द्वेष, मोह और विषाद की तीव्रता बढ़ती है, तो कर्म बंधन का कारण बन सकता है. ज्ञानी आत्माएं परिस्थितियों को भी आत्मकल्याण का साधन बना लेती हैं. साधक के लिए जो परिस्थिति कर्म बंधन का कारण बन सकती है, वही समता, सजगता और आत्मचिंतन के माध्यम से कर्म निर्जरा का साधन बन जाती है. इसके विपरीत सांसारिक जीव कई बार निर्जरा के अवसर को भी नवीन कर्म बंधन का कारण बना देता है.