कोथरुड, 26 सितंबर (आ.प्र.)
श्री वर्धमान सांस्कृतिक प्रतिष्ठान में विराजित गुरु सुमति शिष्य, उपप्रवर्तक, तप दिवाकर गुरुदेव श्री अभिषेक मुनि जी म.सा. ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि परमात्मा ने प्रथम अंग सूत्र श्री आचारांग सूत्र में जीव को प्रमाद से बचने और जागृत होने की प्रेरणा देते हुए कहा है- हे जीव! उठो, प्रमाद मत करो. इसी भाव को उपनिषद की सूक्ति उत्तिष्ठत जाग्रत में भी व्यक्त किया गया है. हे आत्मन! उठो और जागृत हो जाओ. गुरुदेव ने कहा कि संसार में मनुष्य लंबे समय से अज्ञान की निद्रा में सोया हुआ है. जब तक भीतर सम्यक ज्ञान की ज्योति प्रज्वलित नहीं होती, तब तक वास्तविक जागृति संभव नहीं है. इंसान प्रतिदिन सोता है और उठता है, आंखें भी रोज खोलता है, लेकिन यह केवल द्रव्य दृष्टि से जागना है. भाव दृष्टि से आंखें कभी-कभी ही ऐसी खुलती हैं, जिसके बाद व्यक्ति सदैव के लिए सजग, सावधान और जागृत हो जाता है. महापुरुषों की प्रेरणा इसी आंतरिक जागरण के लिए होती है. उन्होंने कहा कि संत निरंतर मनुष्य को सावधान और जागृत रहने की प्रेरणा देते ह्ैं. कुछ लोग संतों की वाणी सुनकर अपने जीवन में परिवर्तन लाते हैं, जबकि कुछ लोग यह सोचकर उसे नजरअंदाज कर देते हैं कि संतों का कार्य ही प्रेरणा देना है.