क्षमावाणी : अहंकार छोड़कर माफी मांगें और माफ करें

    29-Sep-2026
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क्षमादान और क्षमायाचना में बुद्धि सबसे बाधक तत्व बनति है. बुद्धि में असंख्य अनुभवों का संग्रह हो जाता है, विशेषत: कटु अनुभवों का. एक विशाल सूचनाओं का संग्रह मस्तिष्क में समाया हुआ है. किस व्यक्ति ने किस समय, किस तरह मुझे अपमानित किया. मेरा आर्थिक-भौतिक नुकसान किया. कौन-सा बंधुजन समय पर काम नहीं आया. किस पारिवारिक सदस्य का रुख उपेक्षापूर्ण रहा. इस तरह की शतसहस्र- लक्ष-कोटि स्मृतियां बुद्धि प्रकोष्ठ में सुरक्षित रहती हैं और यही स्मृतियां किसी निकट या दूरवर्ती को क्षमा देने से रोकती हैं. हृदय तो बहुधा कहता है कि, भूल जाओ पुरानी रंजिशों को, गिले शिकवे को, कटुतापूर्ण व्यवहारों को, पर बुद्धि है कि हृदय को बेदखल कर निर्णय ले लेती है- ‌‘मैं क्षमादान क्यों दूं, मैं प्रतिशोध लेकर ही संतुष्ट होऊंगी.‌’ किसी की भूल को भूलने की कला बुद्धि के पास नहीं, क्योंकि स्मरण रखना बुद्धि की विलक्षण क्षमता है. माफ करो और भूल जाओ, ये दो शब्द हैं. यदि इनका क्रम रखें, तो क्षमादान शीघ्र संभव है. जो घटना को याद नहीं रख पाते, वे जल्दी क्षमा भी कर देते हैं. भूल गए और क्षमा का झरना स्वत: बहने लगा. क्षमा का दूसरा पक्ष है - क्षमायाचना. इसमें भी सबसे बड़ी बाधा बुद्धि है, अहंकार है. जब मैं गलत नहीं हूं, तो क्षमा क्यों मांगूं? ‌‘मैं‌’ कभी गलत होता ही नहीं, यह धारणा है अहंकार की, बुद्धि की. अपराधी सामने वाला ही होता है. क्षमा मांगनी है तो वह मांगे और मुझ से मांगे, बिना शर्त मांगे, आगे गल्ती नहीं करूंगा- यह कसम खाकर मांगे. यह सारी मांग है अहंकार की. अपने अहंकार ने हमें असफल कर दिया है. महाभारत के रचयिता वेदव्यास जो लिख गए हैं कि, ‌‘क्षमा वीरस्य भूषणम्‌‍‌’ - क्षमा वीरों का आभूषण होता है. हमने महावीर की अनसुनी कर दी. जिन्होंने कहा था - ‌‘खमावणयाए नब्भियत्तंजाणइ‌’ - क्षमा से वातावरण में निर्भयता का संचार होता है. हम मंदिरों में चले जाते हैं. पूजा-पाठ, माला जाप कर लेते हैं. उपवास भी हमारे धार्मिक कार्यों की सूची में हैं. हमारे साथ समस्या यही है कि हम न क्षमा देते हैं, न क्षमा लेते हैं, क्योंकि हम चलते हैं बुद्धि के भरोसे. परमात्मा जाने कब बुद्धि से मुक्त यह संसार क्षमा देगा और क्षमा लेगा. - बहुश्रुत जयमुनि