शिक्षा के नाम पर बच्चों को जीवन के पाठ से वंचित रख रहे हैं

    03-Sep-2026
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osho 
आज हम साेचते हैं बच्चाें काे हम शिक्षा दे रहे हैं, लेकिन जीवन के पाठ से हम उनकाे वंचित रख रहे हैं. और उनकी इतनी फिक्र हम कर रहे हैं कि न वे अपने पाजामा का नाड़ा बांध सकते हैं, वह भी मां बांध रही है.
 
बच्चे राे रहे हैं आज के. किसलिए राे रहे हैं पूछाे उनसे. पुराने जमाने के बच्चे राेते थे कि भाेजन चाहिए, आजकल के बच्चे राे रहे हैं कि उनकाे मां भाेजन करा रही है, उन्हें भाेजन नहीं करना है. आंसू टपक रहे हैं और मां सामने बैठी कि भाेजन कराे. उन्हें भाेजन नहीं करना है, या उन्हें यह भाेजन नहीं करना है, उन्हें आज कुछ और चाहिए कि आज वे जाना चाहते हैं काॅफी हाउस, इडली-डाेसा, या कुछ और. उन पर ध्यान... उनकाे चाैबीस घंटे ध्यान चाहिए. और इस ध्यान से कुछ लाभ नहीं हाेने वाला है उनकाे.
 
बच्चें पर, जब वे रूग्ण हाें, ताे उनकी सेवा करना, लेकिन ध्यान मत देना. इन दाेनाें में बड़ा भेद है. जाे जरूरत हाे, अपेक्षा पूरी करना. उनकी दवा की, जरूरत हाे, दवा देना. उनकाे कंबल उढ़ाना हाे, कंबल उढ़ा लेना. लेकिन ज्यादा उनकी खुशामद मत करना. कहीं ऐसा न हाे कि तुम्हारी खुशामद उनके भीतर बीमारी में न्यस्त स्वार्थ बन जाए. कहीं ऐसा न हाे कि उनकाे लगने लगे कि जब भी ध्यान चाहिए हाे ताे बीमार हाे जाने से मिलेगा.
 
यह जाे जिस लड़के काे पच्चीस साल तक उसकी मां ने ध्यान किया है और ध्यान दिया हे और हर तरह से उसकी फिक्र की है, यह कल विवाहित हाे कर अपनी पत्नी से भी यही अपेक्षा करेगा, और उपद्रव शुरू हाेगा, क्योंकि उसकी भी फिक्र की गयी है. और वह अपने पति से ऐसी अपेक्षा करेगी जैसी अपने पिता से अपेक्षा करती थी. कलह शुरू हाे जायेगी, पहले दिन से कलह शुरू हाे जायेगी. उनकी आकांक्षाएं अपेक्षाएं बड़ी हैं. लड़की चाहेगी कि पति पिता की तरह सारी अपेक्षाएं पूरी करे.
 
पति चाहेगा कि पत्नी मां की तरह सारी अपेक्षाएं पूरी करे. यह कैसे हाे सकता है? दाेनाें की आकांक्षाएं बड़ी हैं, अभिलाषाएं बड़ी हैं. और दाेनाें ही गिरेंगे, क्योंकि दाेनाें ही पूरा नहीं कर पायेंगे. दुनिया ने इतने तलाक कभी नहीं जाने थे. और इतना दुखी दांपत्य जीवन कभी नहीं जाना था. उसके कारण थे, क्योंकि इतनी अपेक्षा कभी नहीं की थी. अपेक्षा का काेई कारण नहीं था.
 
ऊपर से देखने में ताे लगेगा कि अगर ध्यान हमने बच्चाें पर कम दिया ताे नुकसान हाेगा. ऐसा नहीं है. और भी एक बात तुझसे कहूं कि अ्नसर हम बच्चाें पर ध्यान देते हैं जब बच्चे बीमार हाेते हैं, परेशान हाेते हैं, रुग्ण हाेते हैं. वैज्ञानिक हिसाब से जब बच्चे रुग्ण हाेते हैं, परेशान हाेते हैं, बीमार हाेते हैं, तब बहुत ध्यान नहीं देना चाहिए. क्योंकि ध्यान का गलत संबंध जुड़ रहा है. बच्चा बीमार है तब मां उसके पास बैठ कर उसका सिर दबा रही है. अब जब भी इस बच्चे काे भविष्य में सिर दबवाना हाेगा, यह बीमार हाे जायेगा.
 
पतिदेव घर आकर एकदम लेट ही जायेंगे बिस्तर पर. दफ्तर में बिलकुल ठीक थे, घर आते ही सिरदर्द हाे जाता है! वह चाहते हैं कि पत्नी उनका सिर दबाये, पैर दबाये; उनके आसपास खुशामद करे कि वह बड़ा काम करके लाैटे हैं! और पत्नी भी पति जब तक घर नहीं आते तब तक बिलकुल ठीक मालूम हाेती है, रेडियाे सुन रही है और अखबार पढ़ रही है. और जैसे ही पति आये कि बिस्तर से लग जाती है. वह भी चाहती है कि पति उसके सिर पर हाथ रखे. क्योंकि पति हाथ ही सिर पर तब रखते हैं जब पत्नी बीमार हाेती है.