महापुरुषों के गुण जीवन में उतरें तभी उनका स्मरण सार्थक है : श्री अभिषेक मुनिजी

    30-Sep-2026
Total Views |
fd

कोथरुड, 29 सितंबर (आ. प्र.)

श्री वर्धमान सांस्कृतिक प्रतिष्ठान में विराजित गुरुदेव श्री अभिषेक मुनिजी ने कहा कि, पितृ पक्ष के अवसर पर हम उन महापुरुषों की गाथाएं सुन रहे हैं, जिन्होंने अपने जीवन में इतनी उच्च साधना और श्रेष्ठ आचरण किया कि आज वे हमारे लिए प्रातःस्मरणीय एवं वंदनीय हैं. उनके जीवन का स्मरण जितनी बार किया जाए, उतनी ही बार उन्हें पुनः याद करने की इच्छा होती है. यही महापुरुषों की महिमा है. महापुरुषों के गुणों का गुणगान करना आसान है, लेकिन उनके गुणों को अपने जीवन में उतारना कठिन है. हम श्रेष्ठ आत्माओं का बार-बार स्मरण इसलिए करते हैं कि उनके जीवन की कोई शिक्षा, कोई आदर्श हमारे जीवन में भी परिवर्तन ला सके. उनके बताए मार्ग पर चलकर जीवन की संकीर्णता समाप्त हो और उदारता का पदार्पण हो, यही उनके स्मरण की वास्तविक सार्थकता है. भगवान ऋषभदेव ने मानव समाज को जीवन जीने की कला सिखाई और विभिन्न कलाओं का ज्ञान प्रदान किया. इसके पश्चात उन्होंने दीक्षा ग्रहण की और 13 महीने तक अन्न-जल ग्रहण किए बिना कठोर तपस्या की. यह उनके पूर्व जन्म के अंतराय कर्म का परिणाम था. जैन दर्शन की विशेषता है कि तीर्थंकर परमात्मा को भी किए हुए कर्मों का भुगतान करना पड़ता है. उनके जीवन को कर्म-सिद्धांत से अलग कोई चमत्कारिक लीला नहीं माना गया. इस अवसर्पिणी काल में मोक्ष प्राप्त करने वाली प्रथम आत्मा होने का गौरव माता मरुदेवी को प्राप्त है. यह जैन धर्म में नारी शक्ति के सम्मान और उनके आध्यात्मिक सामर्थ्य का अद्भुत प्रमाण है.