महावीर धर्म योगी तो कृष्ण कर्म योगी थे : भव्यगुणाश्री

चातुर्मास में मुंबई के भांडुप में विराजित साध्वी जी ने मार्गदर्शन करते हुए अपने प्रवचन में कहा

    04-Sep-2026
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हमें श्रीकृष्ण के जीवन से विनय का गुण अपने जीवन में अंगीकार करना चाहिए. करूणा निधान श्रीकृष्ण का जीवन विनय की मिसाल है. वह सर्वशक्तिमान होने के बावजूद कभी अहंकारग्रस्त नहीं हुए और हमेशा विनयवान रहे. जो जीवन में विनय धारण करता है उसका यह भव, परभव सुधर जाता है. श्रीकृष्ण ने हमेशा सत्य और विनय की राह पर चलने की प्रेरणा दी ओर अपने मित्र से लेकर गुरु तक सम्मान किया. अहंकार उनके जीवन को छू भी नहीं पाया. जीवन में कोई कमी नहीं होने पर भी उन्होंने हमेशा सबके प्रति करूणा, दया व स्नेह के भाव रखे. ऐसे महान अवतारी पुरुष की दुनिया आज भी पूजा करती है. प्रेम व भक्ति में गहरा सम्बंध होता है. प्रेम हमेशा निस्वार्थ भाव से होना चाहिए. उनका जीवन बताता है कि, जो कर्म में शूरवीर होते हैं वह धर्म में भी शूरवीर होते है. श्रीकृष्ण ने अपने कर्म से हमारी आने वाली तीर्थंकर चौबीसी के लिए तीर्थंकर गौत्र का उपार्जन किया. मातृभक्त होने के साथ श्रीकृष्ण ने मित्रता की भी मिसाल कायम की. द्वारिकाधीश श्रीकृष्ण ने निर्धन सुदामा से जिस तरह मित्रता निभाई वह पूरी दुनिया के लिए मिसाल बन गई, उन्होंने यह बता दिया कि मित्रता के मध्य गरीब-अमीर, छोटा-बड़ा जैसा भेद नहीं हो सकता. गो-पालक के रूप में गायों की सेवा करके जीवदया की भी मिसाल कायम की. इस धरा पर दो महान योगी हुए एक भगवान महावीर व एक श्रीकृष्ण. इनमें महावीर धर्म योगी तो कृष्ण कर्म योगी थे. आज हम कर्मयोगी श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव जन्माष्टमी के रूप में मना रहे है. कृष्ण ने ही संदेश दिया कि कर्म करो फल की इच्छा मत करो. उन्होंने कहा धर्म, परोपकार, दान पुण्य जैसे कर्म करने के बाद मान सम्मान रूपी फल की लालसा नहीं रखनी चाहिए. निष्काम भाव से किए गए कर्म का फल स्वतः प्राप्त होता है. - साध्वी भव्यगुणाश्रीजी, - साध्वी शीतलगुणाश्रीजी, श्री ठाकुरद्वार जैन ेशेताम्बर मूर्तिपूजक संघ, मुंबई