कोथरुड, 4 सितंबर (आ.प्र.) श्री वर्धमान सांस्कृतिक प्रतिष्ठान में विराजित गुरुदेव श्री अभिषेक मुनिजी ने कहा आगमवाणी हम सभी के लिए आदर्श एवं मार्गदर्शक स्वरूप है. परमात्मा महावीर ने आगमवाणी के माध्यम से जीव को अपने बंधनों को जानने, समझने और उनसे मुक्त होने का पुरुषार्थ करने का संदेश दिया है. सबसे पहले यह जानना आवश्यक है कि बंधन क्या है और उन बंधनों से मुक्ति का मार्ग क्या है. श्रीकृष्ण महाराज कर्मयोगी होने के साथ-साथ धर्मयोगी भी थे. उनका जन्म कारागार में हुआ और जन्म से पूर्व ही उनके जीवन पर मृत्यु का संकट मंडराने लगा था. उनके जन्म के साथ ही संघर्षों की एक लंबी यात्रा प्रारंभ हुई, लेकिन अपने पुरुषार्थ और पुण्य के बल पर उन्होंने जीवन को महानता प्रदान की. यदि जीवन की वास्तविकता को समझें तो प्रत्येक जीव का जन्म एक प्रकार के कैदखाने में ही होता है. इस शरीर से बड़ा कोई बंधन नहीं है. जन्म लेना अर्थात एक निश्चित अवधि के लिए शरीररूपी बंधन में आ जाना. जिस जीव ने जन्म लिया है, उसकी मृत्यु निश्चित है. किंतु जन्म और मरण के बीच मिले जीवन को जो आत्मकल्याण, धर्म, सेवा और सद्कार्यों में लगा देता है, वही साधारण जीवन को महापुरुषत्व में परिवर्तित कर देता है. जब-जब रावण जैसे आसुरी प्रवृत्तियों का उदय होता है, तब-तब राम जैसे धर्मपुरुषों का प्राकट होता है. जब कंस जैसी अत्याचारी प्रवृत्तियां बढ़ती हैं, तब कृष्ण जैसे महापुरुषों का जीवन धर्म और न्याय का मार्ग दिखाता है. जब अन्याय और अत्याचार बढ़ता है, तब धर्म ही मानवता का सबसे बड़ा संबल बनता है. मनुष्य पापी से तो डरता है, लेकिन पाप से नहीं डरता.